गोमती नदी

गोमती नदी गंगा की एक जलोढ़ नदी है और साथ में गंगा नदी की एक अहम सहायक नदी भी है। इसका उद्गम मेनकोट के निकट मधोटांडा में फुलहर झील से होता है, जो उत्तर प्रदेश के पीलीभीत शहर के पूर्व से 30 किमी दूर 185 मीटर (हिमालय तलहटी के दक्षिण में 55 किमी) की ऊंचाई पर स्थित है। दक्षिण में दक्षिण-पूर्व दिशा में 950 किमी का सफर तय करने के बाद (61 मीटर की उंचाई पर) कैठी, गाज़ीपुर, वाराणसी सीमा पर गंगा नदी में मिलने से पहले यह नदी सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर और जौनपुर से होते हुए यह नदी दक्षिण की ओर एक छिछली घाटी में बहती है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में गोमती बेसिन आमतौर पर फ्लैट, झुका हुआ है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 200 मीटर से 62 मीटर तक भिन्न मिलती है। अपने उद्गम से 450 किमी दूर, इसकी ऊंचाई में 100 मीटर का अंतर आ जाता है और बाकी का अंतर 500 किमी के बाद दिखाई पड़ता है।

नदी की विशेषता बारहमासी है। बारिश के मौसम के अलावा, जिस वक्त काफी भारी वर्षा होती है, यह नदी पूरे साल काफी धीमी रफ्तार से बहती है, जो इसकी एक प्रकार की विशेषता भी है। इसका 75 प्रतिशत प्रवाह सितंबर माह में हनुमान सेतु, लखनऊ पर 125 क्यूमेक रिकार्ड किया गया है और मईघाट,जौनपुर (साईं-गोमती संगम के बाद) पर 450 क्यूमेक। उक्त स्थानों पर सबसे कम प्रवाह अभी तक अप्रेल माह में देखा गया है, जो क्रमशः 15 क्यूमेक और 25 क्यूमेक है। नदी का कुल जल निकासी क्षेत्र 30,437 वर्ग किमी है। साईं नदी इसकी मुख्य सहायक नदी है, जिसका कुल जल निकासी क्षेत्र 12,900 वर्ग किमी है, लगभग गोमती बेसिन का 43 प्रतिशत क्षेत्र है। नदी के तट पर मुख्य रूप से सीतापुर, लखनऊ, सुल्तानपुर और जौनपुर शहर बसे हुए हैं। 45 निकास द्वारा, आगे जाकर इन क्षेत्रों से नदी में अनुपचारित अपशिष्ट जल मिलने लगता है। इस नदी की अन्य सहायक नदियां-कठीना, भैंसी, सरयन, गों, रेठ, साई, पिली और कल्याणी है, जिनका उद्गम काफी कम दूरी पर होने लगता है और इनके प्रवाह के साथ बेसिन में विभिन्न शहरों और औद्योगिक इकाइयों का गंदा-पानी और औद्योगिक अपशिष्ट भी बहता रहता है। लखनऊ के अतिरिक्त गोमती नदी अन्य शहरों को भी जल आपूर्ति करता है, जो इसके तट पर बसे हुए हैं, जिनमें लखीमपुर खीरी, सुल्तानपुर और जौनपुर शामिल है।

ऊपर उल्लिखित सभी शहर नदी को प्रदूषित करती है, पर इसमें लखनऊ की हालत सबसे ज्यादा खराब है, जहां नदी के कई हिस्से एक नाले के समान प्रतीत होते हैं। अपने प्रवाह के दौरान यह नदी कई ऐसे स्थानों से होकर भी गुजरती है जहां काफी हद तक गंदगी फैली रहती है, क्योंकि यह चीनी प्रसंस्करण, पेपर और प्लाईवुड उद्योगों से होकर गुजरती है। औद्योगिक अपिशिष्ट से लेकर घरेलू गंदगी के साथ, यह नदी 15 छोटे और बड़े शहरों के लिए एक बहते हुए डंपिंग यार्ड में तब्दील हो चुकी है। प्राकृतिक ऑक्सीकरण प्रक्रिया के चलते लखनऊ के बालागंज तक पहुंचते-पहुंचते खुद को अपने आप ही प्राकृतिक रूप से थोड़ा स्वच्छ बना लेती है। फुलहर झील से बालागंज लगभग 350 किमी की दूरी पर स्थित है। बालागंज में ब्रिटिशर्स द्वारा एक रॉ वॉटर पम्पिंग स्टेशन (गौघाट पम्पिंग स्टेशन) स्थापित किया गया था। नदी आगे लखनऊ में 12 किमी तक और बहती है, जिसके बाद इसका आकार सिकुड़ जाता है। विभिन्न 25 बड़े नाले एवं बहुत से छोटे नाले इस नदी में घरेलू वेस्ट से इसे दूषित करते हैं, जिसके चलते गोमती बैराज तक पुहंचते-पहुंचते यह नदी मात्र एक मृत जल निकाय के रूप में बचती है। नदी का प्रवाह नामात्र के बराबर रह जाता है और इसमें मौजूद ऑक्सीजन का प्रतिशत काफी हद तक गिर जाता है।