राष्ट्रीय जल नीति

आवश्यकता

  • जल एक प्रमुक प्राकृतिक संसाधन , एक प्रमुख मानवीय ज़रूरत एवं एक राष्ट्रीय अमूल्य संपत्ति है। जल स्त्रोतों के योजना एवं विकास राष्ट्रीय दृष्टिकोण के स्तर पर होनी चाहिए।
  • ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि देश के कुल 400 लाख हेक्टेयर मीटर वर्षण में से सतही जल की उपलब्धता 178 लाख हेक्टेयर मीटर है, जिसमें से 50 प्रतिशत जल को स्थलाकृतिक और अन्य कृत्रिमता के कारण लाभप्रद उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त देश में 42 लाख हेक्टेयर मीटर की भूजल क्षमता है। पानी की उपलब्धता समय और स्थान दोनों में बेहद असमान है। वर्षण साल में चार में से तीन महीनों तक ही सीमित है जो राजस्थान के पश्चिमी भागों में 10 सेमी से मेघालय के चेर्रापुंजी में1000 सेमी तक बदलाव दिखता है। जल किसी राज्य की सीमा को नहीं मानते। सिर्फ नदियां ही नहीं बल्कि भूमिगत जलभृत भी राज्य की सीमाओं को लांघ जाते हैं। जल एक और अविभाज्य संसाधन के रूप में देखा जाता है-: वर्षा, नदी का जल, सतही तालाब एवं झील एवं भूजल, ये सभी एक ही प्रणाली का हिस्सा हैं। जल विशाल पारिस्थितिकीय प्रणाली का भी एक हिस्सा है।
  • बाढ़ और अकाल ने देश के एक विशाल हिस्से को और राज्य सीमाओं के पार के हिस्से को प्रभावित किया है। देश का एक तिहाई हिस्सा सूखे के खतरे से जूझ रहा है। बाढ़ प्रति वर्ष देश के 9 लाख हेक्टेयर हिस्से को प्रभावित करता है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार, 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ संवेदनशील है। सूखे और बाढ़ से निपटने के लिए प्रबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर संचालित एवं देशा निर्देश की पहल करनी चाहिए।
  • राज्य स्तर पर एकल संचाई या बहुलक्षीय परियोजनाएं को क्रियान्वित करते समय बहुत सारे मुद्दों एवं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है, जैसे- पर्यावरण संरक्षण, प्रभावित मानव एवं पशुओं को सुविधा पहुचाने हेतु परियोजना, जल बाड़े से जनता की सेहत का परिणाम, बांध सुरक्षा आदि। इन मुद्दों पर आम पहल और खामियों के चलते देश में बहुत सारी परियोजनाओं पर असर पड़ा है। परियोजनाओं पर पर्याप्त समय और लागत में वृद्धि होती रही है। कुछ सिंचाई परियोजनाओं में जल-भराव एवं मिट्टी में लवणता की दिक्कतें आती रही हैं, जिससे अच्छी कृषक भूमी पर नकरात्मक असर पड़ा है। जल वितरण के संदर्भ में समानता एवं समाजिक न्याय की भी बहुत सी दिक्कतें आयी हैं। देश के भूजल संसाधनों के विकास एवं पतन ने न्यायिक एवं वैज्ञानिक संसाधन प्रबंधन एवं संरक्षण पर भी कई सारे सवाल खड़े कर दिए। इन सभी सवालों का हल समान योजनाओं एवं रणनीतियों के आधार पर करना होगा।
  • निसंदेह विकासशील प्रक्रियाएं एवं आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि जल की विभिन्न प्रकार की जरूरतों को बढ़ावा दे रही हैं, जैसे- घरेलू, औद्दोगिक, कृषिक, जल-बिजली, नेविगेशन, मनोरंजन आदि। अब तक पानी की मुख्य खपत सिंचाई को माना जाता है। ये अनुमान लगाया जा रहा है कि संचाई क्षमता में आजादी के वक्त 19.5 लाख हेक्टेयर से बढ़कर छठी योजना के अंत तक 68 लाख हेक्टेयर हो गई है। बढ़ती आबादी की खाद्द और फाइबर जरूरतों को पूरा करने हेतु इसकी बढ़ोत्तरी में और जरूरत है। शाताब्दी के अंत तक देश की आबादी 1000 लाख के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है जो वर्तमान में 750 लाख से अधिक है।
  • वर्ष 200 ए.डी तक खाद्द उत्पादन में 240 लाख टन की बढ़त्तरी करनी होगी, जिसमें वर्तमान में 150 लाख टन की बढ़त्तरी आयी है और जिसमें 50 के दशक में 150 लाख टन की बढ़त्तरी आयी थी। मानव एवं पशु की पेयजल की आपूर्ति भी करनी होगी। दशक के अंत तक अंतर्राष्ट्रीय पेयजल आपूर्ति एवं दशक स्वच्छता कार्यक्रम (1981-1991) के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, शहरी एवं ग्रमीण क्षेत्रों की सम्पूर्ण आबादी के जल की आपूर्ति को पूरा कराना होगा एवं शहरी क्षेत्रों की 80 प्रतिशत आबादी को एवं ग्रमीण क्षेत्रों की 25 प्रतिशत आबादी को स्वच्छता सुविधाएँ मुहिया कराना होगा। मुख्य शहरों में एवं आसपास के क्षेत्रों में घरेलू एवं ओद्दोगिक जल जरूरतों पर ध्यान दिया जा रहा है, पर विकास कार्यक्रमों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति में सुधार को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में भी पानी की जरूरत के बढ़ने का अनुमान है। परिस्थियों को देखते हुए यह अनुमानित है कि पनबिजली एवं ताप विद्युत एवं अन्य उद्दोगों में उत्पादन के लिए पर्याप्त जल की मांग बढ़ेगी, जिससे भविष्य में जल संसाधनों की किल्लत बढ़ने की संभावना है, जिससे हम अभी जूझ रहे हैं। यह दर्शाता है कि जल उपयोग में अत्याधिक दक्षता की एवं जल संरक्षण के लिए जन जागरुकता की जरूरत है।
  • अगला महत्वपूर्ण पहलू है जल की गुणवत्ता। जल की गुणवत्ता, रीसाइक्लिंग एवं पुनः इस्तेमाल हेतु संचालित रणनीतियों में सुधार एवं भूजल तथा सतही जल के प्रदूषण को खत्म करने के लिए नई तकनीक एवं अत्याधुनिक संसाधनों पर कार्य करने की जरूरत है। जल संसाधनों के विकास में विज्ञान एवं तकनीक एवं प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण योगदान है।
  • विकासात्मक योजना के तहत जल चुनौतीपूर्ण तत्वों में से एक है। जैसा कि देश अब खुद को उपयोग, संरक्षण, प्रबंधन, विकासशील होने के लिए एवं 21वी शताब्दी में प्रवेश करने के लिए तैयार कर चुका है, तो इस महत्वपूर्ण संसाधन का इस्तेमाल राष्ट्रीय दृष्टिकोण से होना चाहिए। राष्ट्रीय जल योजना का लक्ष्य अब साफ है, जल एक दर्लभ एवं अमूल्य राष्ट्रीय संसाधन है जिसे विकासशील, प्लैन एवं संरक्षित करना होगा और साथ ही पर्यावरण का खयाल रखते हुए एवं समन्वित तरीके से इसकी आपूर्ति करनी होगी।

सूचना प्रणाली

संसाधन योजना के लिए सबसे महत्वपूर्ण एवं मुख्य जरूरत है एक सक्षम सूचना प्रणाली। डेटाबैंक एवं डेटाबेस के साथ एक मानकीकृत राष्ट्रीय सूचना प्रणाली की स्थापना होनी चाहिए जो केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय एजेंसिओं को एकीकृत एवं सुदृढ़ बनाए एवं डेटा की गुणवत्ता एवं कार्यकारी क्षमता को बढ़ाए। डेटा एकीकरण में डुप्लिकेशन खत्म होना चाहिए एवं एजेंसिओं के बीच फ्री डेटा एक्सचेंज प्रणाली काम करनी चाहिए। जल उपलब्धता एवं जल उपयोग डेटा के अतिरिक्त, भविष्य में विभिन्न उद्देश्यों के लिए जल की जरूरतों पर व्यापक एवं विश्वसनीय अनुमानों के भी प्रणाली में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

अधिकतम पानी की उपलब्धता

  • देश में उपलब्ध जल संसाधन अधिकतम संभव सीमा तक उपयोगी संसाधनों की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। अवधारण का विस्तार एवं नुकसान को कम करने के आधार पर संसाधनों के संरक्षण एवं उपलब्धता को बढ़ाना होगा।
  • जल के मामले में हाईड्रोलॉजिकल घाटी या उप-घाटी के लिए संसाधन योजना की जानी चाहिए। सभी प्रत्येक विकासशील परियोजनाओं एवं प्रस्तावों को राज्य द्वारा बनाया जाना चाहिए एवं उसे घाटी या उप-घाटी के संपूर्ण योजना की तरह माना जाना चाहिए, जिससे सबसे बेहतरीन संभव पेय मिश्रण सामने आये।
  • नियोजित विकास एवं नदी घाटी प्रबंधन हेतु उपयुक्त संगठनों की स्थापना की जानी चाहिए। प्रत्येक राज्य व्यापक योजना तैयार करने हेतु बहु क्षेत्रीय इकाइयों की स्थापना की जानी चाहिए जिससे सिंचाई के अलावा जल संसाधनों के अन्य उपयोगों का भी पता लग सके एवं जिससे उपलब्ध जल संसाधनों का संविदा समझौतों के अनूकूल कानून के तहत इस्तेमाल किया जा सके।
  • राष्ट्रीय दृष्टिकोण से क्षेत्र/घाटी के जरूरत के अनुसार जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है वहां दूसरे क्षेत्रों की बदौलत जलापूर्ती करना एवं एक नदी घाटी से दूसरी नदी घाटी में जल को हस्नांतरित करना।
  • जल संसाधन विकास का मुख्य कार्य जल का पुनः इस्तेमाल तथा रिसाइकलिंग होना चाहिए।

प्रोजेक्ट प्लैनिंग

  • जल संसाधन विकास परियोजना को बहुलक्षीय परियोजना की तरह तैयार किया जाना चाहिए। पेयजल का प्रावधान सबसे प्रथम होना चाहिए। परियोजना के तहत जल सिंचाई, बाढ़ शमन, हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पॉवर जनरेशन, नेविगेशन, मछली पालन एवं मनोरंजन के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • परियोजना के दौरान एवं उसके उपरांत मानवीय जिंदगी पर, रहन-सहन पर, व्यवसाय पर, आर्थिक एवं अन्य पहलुओं पर क्या असर पड़ा है इसका ध्यान एवं अध्ययन करना प्रोजेक्ट प्लैनिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • योजना को क्रियन्वान करते समय एवं परियोजना के दौरान पर्यावरण संरक्षण गुणवत्ता एवं पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखना प्रमुख विषय होना चाहिए। यदि कोई प्रतिकूल प्रभाव है तो उसे पर्याप्त क्षतिपूरक उपायों के साथ उसे खत्म किया जाना चाहिए।
  • परियोजना के नियोजन, निर्माण, निकासी और कार्यान्वयन हेतु एकीकृत एवं बहु क्षेत्रीय योजना के दृष्टिकोण से काम किया जाना चाहिए, जिसमें जलग्रहण उपचार एवं प्रबंधन, पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संतुलन, प्रभावित जन-जीवन का पुनरूद्धार एवं कामांड क्षेत्र का विकास सम्मिलित हो।
  • आदिवासी, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों को फायदा पहुचाने हेतु कुछ विशेष प्रयासों द्वारा परियोजनाओं की जांच एवं तैयारी की जानी चाहिए। सामाज के अन्य कमजोर वर्गों एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उत्थान हेतु विशेष ध्यान देते हुए परियोजना तैयार की जानी चाहिए।
  • भौतिक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए एवं खड़ी ढालों, अत्याधिक ढाल एवं मिट्टी के कटाव को ध्यान में रखते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल, हाइड्रो पावर विकास एवं सिंचाई के सुविधा पुख्ता कराने हेतु परियोजनाएं बनाई जानी चाहिए। इन क्षेत्रों में परियोजनाओं के आर्थिक मूल्यांकन का मुद्दा भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • निर्धारित समय एवं धन की अतिश्योक्ति हो जाने के कारण लाभ की हानी का अहसास होने पर सिंचाई परियोजना को अनुकूल आवंटन या संसाधन द्वारा क्षेत्रीय असंतुलन को घटाने के लिए संचालित परियोजना को समय से पूर्व खत्म कर के हानी क्षतिपूर्ति करनी चाहिए।

अनुरक्षण और आधुनिकीकरण

  • विशाल निवेश द्वारा बनाए गए ढांचे एवं प्रणाली का सही प्रकार से अनुरक्षण करना चाहिए। बजट में विशेष तौर पर इसके लिए एक वार्षिक प्रावधान बनाया जाना चाहिए।
  • संरचनाओं एवं प्रणालियों पर निरंतर नजर रखी जानी चाहिए एवं आवश्यक पुनर्वास और आधुनिकीकरण के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।

संरचनाओं की सुरक्षा

बांधों एवं अन्य जल संबंधी संरचानाओं की सुरक्षा पुख्ता कराने हेतु केंद्र एवं राज्य स्तर पर सटीक संगठनात्मक व्यवस्था बनायी जानी चाहिए। परियोजना पर केंद्रीय दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखा जाना चाहिए एवं उसपर निरंतर निगरानी एवं समय समय पर अद्यतन और पुनर्निर्मित किया जाना चाहिए। ऐसी प्रणाली भी होनी चाहिए जिसमें विशेषज्ञों द्वारा परियोजना पर निरंतर निगरानी रखी जानी चाहिए एवं दौरा किया जाना चाहिए।

भूजल

  • वैज्ञानिकी आधार पर भूजल क्षमता को आवधिक समय पर मापा जाना चाहिए, जिससे जल की गुणवत्ता एवं जल की उपलब्धता एवं आर्थिक स्थिति का पता लगता रहे।
  • सामाजिक निष्पक्षक्ता को ध्यान में रखते हुए भूजल संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे कि वो अपनी रिचार्जिंग संभावनाओं से बाहर न जाएं। भूजल रिचार्ज योजना को क्रियान्वान एवं विकासित किया जाना चाहिए जिससे उपलब्ध आपूर्ति बढ़ सके।
  • भूजल एवं सतही जल के एकीकृत एवं समन्वित विकास हेतु इनका संयुक्त उपयोग किया जाना चाहिए एवं परियोजना तैयार करने के शुरुआत से ही इसे परियोजना में उल्लिखित होना चाहिए एवं इसे परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
  • तट के करीब समुद्री जल के मीठे जल जलभृतों में प्रवेश रोकने हेतु भूजल के अति-उपयोग को रोकना होगा।

जल आवंटन प्राथमिकताएं

परियोजना एवं प्रणाली के संचालन में जल आवंटन प्राथमिकताएं निम्न हैं :-

  • पेयजल
  • सिंचाई
  • जल-विद्दुत
  • नेविगेशन
  • औद्दोगिक एवं अन्य इस्तेमाल

हालांकि क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से जरूरत पड़ने पर इन प्राथमिकताओं में संशोधन किया जा सकता है।

पेयजल

1991 तक सभी ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की पूरी आबादी को पर्याप्त पेयजल सुविधा मुहैया करायी जानी थी। सिंचाई एवं बहुलक्षीय परियोजनाएं निरपवाद रूप से पीने के पानी के घटक में शामिल करना चाहिए। जहां कहीं भी पेयजल के स्त्रोत का कोई विकल्प नहीं है, उन क्षेत्रों में उपलब्ध किसी भी प्रकार के जल पर इंसान तथा जीवों का पेयजल के समकक्ष ही अधिकार है।

सिंचाई जल

  • किसी विशिष्ट या किसी घाटी की सिंचाई परियोजना को संज्ञान में रखते हुए जमीन की उपयोग्यता एवं कीमत को समझते हुए सभी उपलब्ध जल स्त्रोतों एवं उपयुक्त सिंचाई तकनीक द्वारा सिंचाई को प्रभावित करने वाले विकल्पों का उपयोग करना होगा। सिंचाई तीव्रता इतनी होनी चाहिए जिससे आधिकाधिक कृषि निर्भर परिवारों तक सिंचाई का लाभ प्राप्त हो सके एवं उत्पादन में वृद्धि हो सके।
  • जल उपयोग एवं भूमी उपयोग परियोजनाओं का काफी हद तक एकीकरण होना चाहिए।
  • सिंचाई प्रणाली में जल आवंटन समाजिक एवं निष्पक्षता आधारित होना चाहिए। घुर्णी जल वितरण प्रणाली के आधार पर ऊपरी एवं निचले तबके, छोटे एवं बड़े खेतों तक पानी की पूर्ति की जानी चाहिए एवं सभी तक जल वितरण अनुमापन द्वारा होना चाहिए जिससे की असमानता का अंतर खत्म हो जाए।
  • सिंचाई क्षमता को बढ़ाने हेतु कुछ ठोस कदम उठाए जाने चाहिए एवं इस बात का निश्चय कर लेना चाहिए कि विकसित क्षमता एवं इस्तेमाल हुई क्षमता के बीच का अंतर खत्म हो चुका है। सभी सिचांई परियोजनाओं में इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु कमांड एरिया विकास दृष्टिकोण से काम होना चाहिए।

पानी की दरें

जल की दरें इस प्रकार होनी चाहिए जिससे उपभोक्ता तक संसाधन की कमी की आपूर्ति की जा सके या जल उपयोग में आर्थिक तरक्की हो सके। वार्षिक संरक्षण एवं संचालन लागत एवं निर्धारित लागत को वसूल करने में इन्हे सक्षम होना चाहिए। एक निर्धारित समय में इस लक्ष्य तक पहुंचना होगा एवं इसके ही समकक्ष सिंचाई जल की समय पर आपूर्ति भी की जानी चाहिए। सतही जल एवं भूजल को एक उचित दर पर तय करना होगा जिससे छोटे एवं औसतीय कृषको पर इसका ज्यादा प्रभाव न पड़े।

कृषकों एवं स्वच्छिक एजेंसियों की भागीदारी

सिंचाई प्रणाली के विभिन्न प्रबंधन में कृषकों की भागीदारी को बढ़ाने हेतु कुछ ठोस कदम उठाए जाने चाहिए खासतौर पर जल वितरण एवं जल दरों को एकतृत करने के लिए। जल उपयोग एवं जल प्रबंधन में कृषकों का ज्ञानवर्धन हेतु स्वेच्छिक एजेंसियों को भी पहल कर आगे आना होगा एवं मदद करनी होगी।

जल गुणवत्ता

सतही जल एवं भूजल, दोनो की गुणवत्ता पर निरंतर ध्यान रखने की जरूरत है। जल गुणवत्ता को बढ़ाने हेतु कुछ कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा।

जल का क्षेत्रीकरण

जल उपलब्धता के अनुरूप आर्थिक विकास एवं कृषक प्रक्रियाओं, औद्दोगिक एवं शहरी विकास हेतु कुछ ठोस एवं समझदारी वाले कदम उठाने होंगे एवं उन्हें क्रियान्वित करना होगा। देश में जल क्षेत्रीकरण के कदम उठाए जाने चाहिए एवं क्षेत्रीकरण के अनुरूप ही आर्थिक गतिविधियों का निर्देशन एवं संचालन होना चाहिए।

जल संरक्षण

जल उपयोग्यता की महत्वता को समझते हुए जल के विभिन्न उपयोगों को में सुधार लाना होगा एवं जल संसाधनों की कमी को दूर करने हेतु जन-जन में जागरुकता अभियान चलाना होगा। संरक्षण की यह आदत शिक्षा, संचालन, प्रोत्साहन एवं हतोत्साहन के जरिए की जानी चाहिए।

बाढ़ नियंत्रण एवं प्रबंधन

प्रत्येक बाढ़ प्रवण घाटी के लिए बाढ़ नियंत्रण एवं प्रबंधन का एक बेहतरीन प्लान होना चाहिए। मृदा संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्र उपचार, तट के संरक्षण का प्रचार प्रसार के द्वारा ध्वनि जलग्रहण प्रबंधन से बाढ़ की तीव्रता को रोका जाना चाहिए। जल भंडारण परियोजनाओं को पर्याप्त बाढ़ रोधक संसाधन को उपलब्ध कराना होगा ताकि बेहतर बाढ़ प्रबंधन पर अमल किया जा सके। एक ऐसी प्रणाली की स्थापना की जानी चाहिए जिससे की बाढ़ आने से पूर्व उसका पता लगाया जा सके एवं अधिकाधिक हानी से बचा जा सके एवं बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों का संचालन किया जा सके। इससे जान-माल का नुकसान भी कम होगा। भौतिक बाढ़ संरक्षण से बचाव के लिए तटबंधो एवं डाइक का निर्माण कराया जाएगा जिससे हानी से क्षति को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकेगा।

नदी या समुद्र द्वारा भूमी कटाव

अनुकूल विकल्पों एवं उपायों द्वारा समुद्री तटीय क्षेत्रों एवं नदी जल अंतर्देशीय द्वारा होने वाले भूमी कटाव को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकता है। राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों को भी यह कदम उठाना होगा और यह समझना होगा कि अंधाधुध हो रहे व्यापार एवं तटीय पंक्तियों के उपयोग को कम करे एवं उसी स्थान पर आसपास के इलाकों की आर्थिक गतिविधियों को संचालित करे।

अकाल प्रबंधन

  • अकाल प्रवण क्षेत्रों को अकाल से होने वाली दिक्कतों से दूर रखने के लिए मिट्टी में नमी का संरक्षण करने के उपाये, जल संचयन प्रक्रियाओं, वाष्पीकरण की कमी को घटाना, भूजल की क्षमता को बढ़ाना एवं तटीय जल को उचित स्थानों से स्थानांतिरत करना जैसे उपायों को अपनाना होगा। कम जल की जरूरत वाले प्रक्रयाओं को जैसे- चराई, वानिकी एवं अन्य विकासशील उपायों की ओर ध्यान एवं बढ़ावा देना होगा। जल संसाधन विकास परियोजनाओं के तैयार करते समय अकाल प्रवण क्षेत्रों की ओर मुख्य रूप से ध्यान देना होगा।
  • अकाल प्रभावित आबादी को रोज़गार प्रदान करना अकाल राहत कार्य का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए।

विज्ञान एवं तकनीक

जल संसाधनों के प्रभावशाली एवं आर्थिक प्रबंधन के लिए विशेषज्ञों को आगे आना चाहिए एवं विभिन्न क्षेत्रों में खोज एवं अनुसंधान करना चाहिए, जिनमें से कुछ निम्न हैं :

  • हाईड्रोमीटरोलॉजी
  • जल संसाधनों का आकलन;
  • हिमपात और झील जल विज्ञान;
  • भूमिगत जल विज्ञान और पुनर्भरण;
  • लवणता प्रवेश की रोकथाम;
  • जल संचयन;
  • वाष्पीकरण और टपका घाटा;
  • जल संसाधन परियोजनाओं के लिए आर्थिक डिसाइएनें;
  • फसलें और फसल प्रणालियां;
  • जलाशयों के अवसादन;
  • जल संबंधित संरचनाओं की सुरक्षा एवं दीर्धायु;
  • रिवरमॉरफोलॉजी एवं हाइड्रोलिक्स;
  • मृदा एवं सामग्री अनुसंधानशाला;
  • बेहतर जल प्रबंधन गतिविधियां एवं संचालित तकीनीक मे सुधार
  • रीसाइक्लिंग और पुन: उपयोग;
  • समुद्री जल संसाधनों का उपयोग;

प्रशिक्षण

मानकीकृत प्रशिक्षण के लिए योजना के परिप्रेक्ष्य ही जल संसाधन विकास का मुख्य हिस्सा होना चाहिए। जिसके अंतर्गत सूचना प्रणाली, क्षेत्रीय प्लैनिंग, परियोजनाओं की योजना और निर्माण, परियोजना प्रबंधन, परियोजनाओं का संचालन एवं उनका भौतिक ढांचा एवं जल वितरण प्रणाली आती है। सभी सम्मिलित कर्मचारियों के साथ-साथ कृषकों को भी इसकी पुख्ता प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

उपसंहार

मनुष्य एवं पशु के जीवन में, प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने हेतु एवं आर्थिक तथा हर तरह की विकासशील गतिविधियों के लिए जल के महत्व का पता चलता है अतः अति शीघ्र जल की बढ़ती कमी को देखते हुए कुछ सर्वोत्तम एवं ठोस कदम उठाने की एवं प्लैनिंग एवं प्रबंधन करने की आवश्यक्ता है, जिससे समय रहते इस समस्या से जूझा जा सके। राष्ट्रीय जल परियोजना का विकास पूरी तरह राष्ट्रीय सहमति और प्रतिबद्धताओं के विकास एवं संरक्षण एवं इसके सिद्धांतों एवं लक्ष्यों पर निर्भर करता है।