राज्य जल नीति

प्रसतावना

प्रदेश में प्रचुर मात्रा में संपन्न जल संसाधन उपलब्ध हैं, जिससे ये प्रतीत होता था कि इतने संसाधन पर्याप्त हैं लेकिन जल की विभिन्न प्रकार की जरूरतों के अनुरूप जैसे- सिंचाई, पेयजल एवं घरेलू इस्तेमाल हेतु, पावर (थर्मल एवं हाइड्रो), औद्दोगिक एवं अन्य इस्तेमाल के चलते एवं बढ़ती आबादी के साथ संसाधनों की उपलब्धता में कमी आ गई है। जल एक मुख्य प्राकृतिक संसाधन, आम मानवीय जरूरत एवं अमूल्य संपत्ति है। राज्य के जल संसाधन के विकास एवं प्लैनिंग को राज्य स्तर पर ही विकासशील बनाना होगा।

जल उपलब्धता

सिंचाई परिक्षेत्र जो कि जल संसाधन का सबसे मुख्य उपभोक्ता रहा है, लगभग 161.70 बीसीएम (131.0 एम.ए.एफ) सतही जल से एवं लगभग 72 बीएमसी (58.4 एम.ए.एफ) उपयोगी भूजल से लगभग 43.8 बीसीएम (35 एम.ए.एफ) सतही जल का एवं लगभग 27 बीसीएम (21.9 एम.ए.एफ) भूजल का उपभोक्ता है। क्रियान्वित परियोजना के समापन के बाद लगभग 27.8 बीसीएम (22.5 एम.ए.एफ) सतही जल का इस्तेमाल कर चुका होगा। वर्तमान में 43.2 बीसीएम (35 एम.ए.एफ) जल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। अतः 22.2 बीसीएम (18.0 एम.ए.एफ) जल बचा है। 24.7 बीसीएम (20.एम.ए.एफ) जल पेय, उद्योगिक एवं प्रदूषण नियंत्रण के लिए संरक्षित करने के बाद शेष भविष्य में सिंचाई परियोजनाओं में इस्तेमाल किया जाएगा।

प्रदेश में लगभग 20 एमएचए कृषिक भूमी है जिसमें से वर्तमान में 17.4 एमएचए भूमी कृषि के इस्तेमाल के लिए उपयोग में लायी जा रही है। वर्ष 2020 तक अनुमानित 270 लाख आबादी के लिए मूल्यांकित 63 लाख टन खाद्दान की जरूरत पड़ेगी। उत्पादन के वर्तमान स्तर पर सिंचाई एवं अन्य उपायों एवं संसाधनों के चलते 1.7 टन/हेक्टेयर की प्राप्ती की जा चुकी है। अनुमानित खाद्दान उत्पादन हेतु 3.4 टन/हेक्टेयर के आंकड़े के छुना होगा। इस आंकड़े तक पहुचने के लिए हमें उत्पादन हेतु पर्याप्त सिंचाई सुविधा, अन्य जरूरी संसाधन को उपलब्ध कराना होगा एवं जल संसाधन प्रबंधन में सुधार लाना होगा, जिससे उत्पादन के क्षमता बढ़ाई जा सके एवं अनुमानित आंकड़े को पूरा किया जा सके।

प्रदेश में जल संसाधनों की उपलब्धता कराते समय इस बात का ध्यान रखा जाना जरूरी है कि पेयजल एवं घरेलू इस्तेमाल हेतु जल की आपूर्ति सबसे महत्वपूर्ण है। वर्ष 2025 तक शहरी एवं ग्रामीण की कुल आबादी तक जन-जीवन को पर्याप्त पेयजल की सुविधा प्रदान करना ही प्रदेश का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। शहरी एवं ग्रामीण आबादी को स्वच्छता हेतु पर्याप्त सुविधा मुहैया कराना भी प्रदेश प्रशासन के कार्यों का एक प्रमुख हिस्सा है।.

हाइड्रो पावर

मूल्यांकित प्रादेशिक हाईड्रो पावर 15000 मेगावॉट है जिसके सापेक्ष अभी तक 1500 मेगावॉट का उपयोग किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त परियोजना के लिए 15000 मेगावॉट पावर का मूल्यांकन किया गया है जो नेपाली क्षेत्र में अवस्थित है। राज्य निरंतर ही पावर की कमी से जूझ रहा है। इसके अतिरिक्त कुल ऊर्जा जरूरतों में कमी से पावर की कमी में और तीव्रता से गिरावट आयी है। पर्यावरण के अनुकूल एवं अक्षय स्रोत का उपयोग करने के अतिरिक्त समस्या से जूझने के लिए पीक पावर की कमी के लिए हडल पावर का इस्तेमाल सबसे सुविधाजनक रहेगा।

उद्दोग

औद्दोगिक विकास हेतु वर्तमान औद्दोगिक परिस्थितियों को देखते हुए राज्यों को तीव्रता से आगे बढ़ना होगा एवं जिससे अंतर्गत जल की पर्याप्त मात्रा का ही उपयोग किया जाना चाहिए। जल संसाधन प्लैनिंग के अंतर्गत औद्दोगिक जल के इस्तेमाल हेतु भी कुछ प्रावधान बनाए जाने चाहिए।

पारिस्थितिकी और स्वास्थ्य

पारिस्थितिकी, नौवहन, मनोरंजन एवं अन्य जरूरतों के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान बनाए जाने चाहिए। हमें जल की क्षमता बढ़ाने, प्रदूषण से जल का संरक्षण एवं जल समस्याओं से निपटने हेतु कुछ ठोस कदम उठाने होंगे एवं उसपर गहनता पूर्वक विचार करना होगा।

सतही एवं भूजल संसाधनों को मद्देनजर रखते हुए राज्य की वर्तमान में इसकी मौजूदगी एवं वर्तमान जरूरत एवं 2025 तक इसकी जरूरत को ध्यान में रखते हुए हमें विवेकपूर्ण एवं अनुकूल उपयोग, सही इस्तेमाल, संरक्षक्षण एवं प्रबंधन जैसे मुद्दों की ओर ध्यान देना होगा। अगर अलग-अलग इस्तेमाल के चलते योजना से हठ कर कुछ दिक्कतें आ गयीं तो हमें उन समस्याओं से जूझने के लिए भी तैयार रहना होगा।

राज्य जल नीति की आवश्यकता

विकास परियोजना के तहत जल संसाधन एक संगीन मुद्दा है। इस सीमित संसाधन के संरक्षण की परियोजना विकास के दृष्टिकोण से होनी चाहिए, जो सदा भौगोलिक परिस्थितियों, हाईड्रलॉजिकल स्थिति (सतही एवं भूजल), जल आवंटन एवं अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों को ध्यान में रख के किया जाना चाहिए। अतः इस अमूल्य संसाधन के संरक्षण के लिए ऐसी “राज्य जल नीति” चाहिए जिससकी योजना एवं प्लैनिंग स्पष्ट एवं विकासशील हो। भारत सरकार ने सन् 1987 में ‘राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद’ के संरक्षण के तहत ‘राष्ट्रीय जल नीति’ को अपनाया जिसे राज्य एवं केंद्र शासित राज्यों ने भी अपनाया। 1998 राष्ट्रीय जल नीति के संशोधित मसौदे के राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद को स्वीकृति के लिए सौंपा गया। भारतीय संविधान के तहत राज्य जल नीति को संचालित करते समय राष्ट्रीय जल नीति के दिशा निर्देशों, जरूरतों एवं सभी सीमाओं को ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए।

लक्ष्य

राज्य जल नीति को अपनाते हुए उत्तर प्रदेश की जल नीति के कुछ मुख्य लक्ष्य एवं मुद्दे नीचे दिए गए हैं -

  1. उपलब्ध संसाधनों का ठीक तरीके इस्तेमाल एवं अमूल्य जल संसाधन के संरक्षण को सुनिश्चित करना।
  2. प्राधिकरण एवं शक्तियों को विकेंद्रत कर एवं उपभोक्ता की भागीदारी को सुनुश्चित करते हुए जल संसाधन प्रबंधन में कुछ महत्वपूर्ण विकासशील कार्य़ करना।
  3. नियम एवं कानून को ध्यान में रखते हुए सतही एवं भू जल की गुणवत्ता को बनाए रखना।
  4. परियोजना के विकास हेतु उसका अधिकाधिक प्रचार-प्रसार करना। जल के विभिन्न प्रकार के इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए, सतही एवं भू-जल के संसाधनों के उपयोग को ध्यान में रखते हुए एवं घाटी या उप-घाटी परिकल्पना को ध्यान में रखते हुए परियोजना का सही ढंग से इस्तेमाल करना एवं उसका प्रचार प्रसार करना।
    1. पेयजल एवं घरेलू इस्तेमाल हुते जल की पर्यापत् आपूर्ति करना।
    2. सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराना.
    3. अन्य उपभोक्ताओं होने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए हाईड्र पावर का विकास करना।
    4. औद्दोगिक एवं कृषिक इस्तेमाल हेतु जल उपलब्ध कराना।
    5. नेविगेशन, मनोरंजन, स्वास्थ्य के लिए और अन्य उपयोगों के लिए पानी उपलब्ध कराना
  5. जल संसाधनों के विकास के समय पारिस्थितिकी और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना।
  6. जल संसाधन आवंटन एवं प्रबंधन में उपभोक्ताओं में समानता एवं समाजिक न्याय की सोच को बढ़ावा देना।
  7. जल संसाधन विकास में आत्म स्थिरता को सुनिश्चित करना।
  8. जल संसाधन विकास में बाढ़ प्रबंधन एवं जलनिकास जैसे मुद्दों पर विचार करना।
  9. प्रबंधन का कानूनी रूप से प्रारूप प्रदान करना।
  10. नीति के पूर्ण रूप से संचालन होते प्रबंधन सूचना प्रणाली को प्रदान करना।
  11. जल संसाधन क्षेत्र में परिक्षण एवं प्रशिक्षण सुविधाओं को बढ़ावा देना।
  12. विभिन्न उपभोक्ताओं के बीच समस्याओं के समाधना के लिए उपायों को भी प्रदान करना।

सूचना प्रणाली

एक विकसित सूचना प्रणाली के लिए मुख्य आपेक्षत है संसाधन योजना। डेटाबैंक एवं डेटाबेस के साथ एक मानकीकृत राष्ट्रीय सूचना प्रणाली की स्थापना होनी चाहिए जो केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय एजेंसिओं को एकीकृत एवं सुदृढ़ बनाए एवं डेटा की गुणवत्ता एवं कार्यकारी क्षमता को बढ़ाए।

डाटा की कोडिंग, वर्गीकरण, संचालन एवं तरीके / प्रक्रियाओं के लिए कुछ मानकीकरणों का अनुपालन होना चाहिए। समस्त संसथाओं के बीच फ्री डाटा आदान-प्रदान हेतु एक आधुनिक सूचना प्रणाली को बढ़ावा देना होगा एवं सूचना तकीनक को अत्याधुनिक बनाना होगा। निश्चित समय के अंतर्गत डाटा को एकीकृत, प्रचार एवं प्रसार हेतु कुछ महत्वपूर्ण उपायों के साथ तकीनीकि क्षमता को बढ़ाना होगा।

जल उपलब्धता एवं उसके इस्तेमाल संबंधी डाटा के अतिरिक्त भविष्य में विभिन्न उपयोग हेतु जल को देखते हुए व्यापक और विश्वसनीय अनुमानों को भी प्रणाली में दर्शाना होगा।

जल संसाधन प्लानिंग

बेसिन प्लानिंग

जल संसाधनों की योजना बनाते समय सतही जल (नदी की घाटी या उप घाटी के संदर्भ में) एवं भू-जल संसाधनों के विकास हेतु भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने चाहिए। विकासशील मुद्दों में इस इकाई को भी महत्वपूर्ण ध्यान दिया जाना चाहिए एवं सतही एवं भ-जल को मद्देनजर रखते हुए योजनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए एवं जल निकासीय को भी परियोजना का अहम मुद्दा माना जाना चाहिए।

परियोजना को इस प्रकार बनाया जाना चाहिए जिससे जल के विभिन्न उपयोगों के लिए वो एक बहुलक्षीय परियोजना साबित हो।

क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने के लक्ष्य से विकास के मुख्य प्रमुखताओं में शामिल किए जाने चाहिए। इस संदर्भ में अधिक जल उपलब्धता वाले क्षेत्रों से जिन क्षेत्रों में जल संसाधनों की कमी है वहां जल का स्थानंतरण किया जाना चाहिए।

राज्य में सतही जल का वितरण अनियमित रूप से समय एवं जगहों पर होता है एवं भू-जल का अनियमित वितरण स्थानों पर होता है। योजना बनाते समय इस बात का ध्यान रखना होगा की इस निरंतरता को कैसे खत्म किया जाए।

डेटाबेस

दीर्धकालीन, सुदृढ़ एवं भरोसेमंद डेटाबेस ही जल संसाधन प्लानिंग का मुख्य मुद्दा होना चाहिए। वर्तमान संचालित सूचना एवं डाटा एकीकरण प्रणाली को अत्याधुनिक बनाने की ज़रूरत है एवं डाटा की गुणवत्ता को सुधारने एवं प्रसंस्करण क्षमताओं को सुदृढ़ बनाना होगा।

पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरण

जल संसाधन परियोजनाओं को पारिस्थितिक एवं पर्यावरण के दृष्टिकोण से देखना होगा एवं परिस्थिति अनुसार उन परियोजनाओं में संशोधन करना चाहिए एवं उन्हें तत्पश्चात् क्रियान्वित किया जाना चाहिए। प्राकृतिक धाराओं में एक न्यूनतम प्रवाह की अनुमति दी जानी चाहिए।

पुनर्स्थापन और पुनर्वास

निर्माण के दौरान एवं पश्चात् मानव जिंदगी पर, व्यवसाय स्थापना में आर्थिक एवं अन्य प्रक्रियाओं पर परियोजना का पड़ने वाला प्रभान जल संसाधन परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर परियोजना से कोई प्रभाव पड़ता है तो उसमें पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रमुख हिस्सा होना चाहिए एवं उस हानी की भारपाई करने हेतु तत्काल प्रभाव से निर्णय लिए जाने चाहिए। क्योंकि जल संसाधन परियोजना एक ऐसी परियोजना है जिससे तमाम जन-जीवन विकास परियोजनाएं प्रभावित होंगी, इसलिए इससे निपटने के लिए कुछ सिद्धांतों पर कार्य किया जाना चाहिए एवं बहुक्षेत्रीय टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए।

जल संचयन

जल संसाधन परियोजना के तहत जल संचयन को प्रमुखता दी जानी चाहिए। भू-जल के स्तर को बढ़ाने के लिए अल्प सतही जल क्षेत्रों में कार्य किया जाना चाहिए एवं उसे जल्द से जल्द क्रियान्वित किया जाना चाहिए।

बाढ़ सुरक्षा

किसी घाटी या उप घाटी के लिए बनायी जा रही जल संसाधन परियोजना में बाढ़ सुरक्षा जैसे मुद्दे को प्रमुखता दी जानी चाहिए।

आवंटन प्राथमिकताएं

प्रणाली की योजना एवं संचालन के दौरान, राज्य जल आवंटन की प्राथमिकताएं विस्तारपूर्वक निम्न हैं:-

  • पेयजल
  • सिंचाई
  • हाइड्रो और थर्मल पावर
  • कृषि उद्दोग एवं गैर-कृषि उद्दोग
  • नेविगेश एवं अन्य उपयोग

हालांकि इन प्राथमिकताओं में क्षेत्र अनुसार एवं जरूरत अनुसार बदलाव किए जा सकते हैः-

सिंचाई

सिंचाई की वर्तमान स्थिति को देखकर एहसास होता की इन पांच सालों के अंदर इस क्षेत्र में पर्याप्त विकास किया जा चुका है पर ऐसा भी प्रतीत होता है कि संसाधनों की उपलब्धता एवं जरूरत अभी भी अधूरी है एवं उसे और पूरा किया जाना है। दो सूत्री नीति (i) अप्रयुक्त संसाधनों का उपयोग (ii) पहले से ही इस्तेमाल संसाधनों के प्रबंधन में गुणात्मक सुधार इस संदर्भ में निम्न प्रक्रियाएं होनी चाहिए-

अप्रयुक्त संसाधनों का उपयोग:

  • सतही जल एवं भ-जल स्तर पर 2025 तक परिप्रेक्ष्य योजना की तैयारी पैरा 4 में संबोधित किए गए हैं। कार्यान्वयन अनुसूची प्रक्रिया में निरंतरता सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि फंड, विशेषज्ञता, उपकरण एवं प्रशिक्षित जनशक्ति के अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सकें।
  • आमतौर पर जल संसाधन परियोजनाएं विशष तौर पर बहुउद्देशीय परियोजनाएं पूंजी वहन होते हैं जो लंबे समय तक चलते हैं, इसलिए परियोजना के दृष्टिकोण से दीर्धकालीन निवेश निर्णय लिए जाने चाहिए जिससे कि उन्हें निर्धारित समय के अंदर ही खत्म किया जा सके।
  • परियोजनाओं को इस प्रकार बनाया जाना चाहिए जिससे वो आत्मनिर्भर रहें। वर्तमान में लाभ अनुपात अप्रत्यक्ष लाभ के आधार पर निर्धारित किया जाता है जो सीधे राज्य को प्राप्त होता है न कि परियोजना को। इसलिए, आत्म स्थिरता की अवधारणा पर अमल करने की जरूरत है। गौरतलब है कि सिंचाई कृषि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो पानी के मूल्य निर्धारण पर आर्थिक प्रभाव डालता है, इसलिए इस उद्देश्य के लिए “टैरिफ नियामक संस्था” गठित करने का प्रस्ताव है।

सिंचाई जल प्रबंधन- सिंचाई क्षेत्र में निवेश का पूरा लाभ लेने के लिए, प्रभावशाली प्रबंधन, वैज्ञानिक दृष्टि से किफायती उपयोग एवं दोहन जल को संरक्षित करना अनिवार्य है। वर्तमान परिस्थित में गुणवत्ता सुधार हेतु इस क्षेत्र में पर्याप्त गुंजाइश है, जिसके चलते निम्न कार्य करने की ज़रूरत है।

राज्य की विस्तृत सिंचाई प्रणाली में लगभग 74000 किमी चैनल हैं, जिनमें से कुछ 150 साल से भी ज्यादा पुराने हो चुके हैं एवं जिन्हें मरम्मत एवं पुनःनिर्माण की सख्त जरूरत है। भविष्य की जरूरतों को पूरा करने हेतु इन चैनलों का अधुनिकीकरण एवं सुधार करना अति आवश्यक है।

  1. परिवहन प्रबंधन में सुचार रूप से सुधार किए जाने चाहिए क्योंकि बहुत सी प्रणाली नदी योजनाओं के चलते ठप हो गयी हैं। इन प्रणालियों को पर्याप्त तकनीक द्वारा अत्याधुनिक बनाना होगा जिससे की संसाधनों की आपूर्ति जल्द और पर्य़ाप्त मात्रा में में हो सके एवं जरूरतों को पूरा किया जा सके। इसके अतिरिक्त निम्न मुद्दों पर गौर पूर्वक ध्याना दिया जाना चाहिए:-
    • जरूरत की प्राथमिकताएं एवं उपलब्धता के अनुसार पर्याप्त एवं उचित एम.आई.एस होना चाहिए जिससे प्रणाली का सुचारु रूप से संचालन हो सके।
    • निम्न उपायों को अपनाते हुए घाटों में कटौती को सदा के लिए सुनिश्चित करना होगा-

      * नालों की लाइनिंग हेतु उचित उपयोग.
      * नालों एवं अन्य चीजों की गैर कानून कटान पर निगरानी रखना

  2. क्षेत्र स्तर पर जल के कुशल उपयोग हेतु उच्च प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए “क्षेत्र प्रबंधन” पर काम किया जाना चाहिए, जिसमें इसकी व्यवस्था एवं बकाया राशि की समुचित वसूली की इक्विटी सुनिश्चित की जाती है। निम्न उपायों पर गौर किया जाना चाहिए
    • कमांड क्षेत्रों (खेतों का समतल सुधार एवं जल संसाधन का संरक्षण आदि) में सुधार हेतु तीव्र गति से जरूरतों का निर्गम किया जाना चाहिए।
    • कृषि उत्पादन हेतु बेहतर सिचांई एवं कृषिक प्रक्रियाओं को तकीनीकि मदद से जल का उपयुक्त इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा। इस प्रणाली को अनुकूल क्षेत्र में बेहतर फसल पद्धति के लिए अपनाना होगा।
    • सिंचाई जल प्रबंधन के समय छोटे एवं सीमांत किसानों की जरूरतों के लिए विशेष रूप से विचार किया जाना चाहिए एवं उस पर अमल किया जाना चाहिए।

बाढ़ प्रबंधन

डाटा

राज्य के 29.44 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से 7.336 लाख हेक्टयर क्षेत्र बाढ़ प्रवण के अंतर्गत आता है। बाढ़ नियंत्रण एवं इसके प्रबंधन आजादी के बाद से राज्य के विकास योजना के शुरुआत से ही मुख्य प्रयास रहे हैं। अभी तक राज्य योजना के तहत 1.54 लाख हेक्टेयर भूमी क्षेत्र को बाढ़ सुरक्षा के तहत मदद मिली है। बाढ़ की समस्या एक घाटी समम्या की भाती ही प्रतीत होती है जो राज्य के सीमा में नही आती है। अतः गंगा घाटी में बाढ़ समस्या से निपटने के लिए एमओडब्लूआर, भारत सरकार के तहत जीएफसीसी का गठन किया गया, जो सर्वोच्च तकनीकी सलाहकार निकाय है। राज्य स्तर पर बाढ़ नियंत्रण के लिए राज्य बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया जिसका अध्यक्षता राज्य के मुख्यमंत्री को सौंपी गई जो उच्च स्तरीय फैसले ले सके एवं जल्द से जल्द उसे क्रियानवान कर सके।

परिप्रेक्ष्य योजना

दीर्धकालीन परिप्रेक्ष्य योजना का गठन सन् 1988 में रुपए 10,000 करोड़ की लागत के साथ किया गया था जिसका उद्देश्य सभी बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को संरक्षण देना था। हालांकि संसाधनों की कमी के चलते इसको क्रियनवान करने में कुछ खास सफलता हाथ नहीं लग पायी।

उक्त बिंदुओं पर गौर करते हुए बाढ़ के क्षेत्र में निम्न प्रस्तावित कदम उठाने की जरूरत है:-

  • 2025 तक परिप्रेक्ष्य योजना के तहत उन क्षेत्रों के लिए प्रथामिकताएं तय की जाएंगी एवं उनमें काम किया जाएगा जो आवृत्ति एवं सीमा के दृष्टिकोण से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
  • परिप्रेक्ष्य योजना के तहत तय किए गए उद्देश्यों के मद्देनजर राशी प्रदान करी जाएगी।
  • जल संसाधन परियोजना का तैयार करते समय बाढ़ संरक्षण, जल भराव और जल निकासी विसंकुलन को ध्यान में रखते हुए उसे परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
  • “टैरिफ नियामक संस्था” के गठन का प्रस्ताव जल शुल्क निश्चित करने के लिए किया गया है एवं सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए जो क्षेत्र बाढ़ से संरक्षित हैं उनपर उपकर लगाने का सुझाव देना है। .

अकाल प्रबंधऩ

अकाल प्रवण क्षेत्रों को अकाल से होने वाली दिक्कतों से दूर रखने के लिए मिट्टी में नमी का संरक्षण करने के उपाये, जल संचयन प्रक्रियाओं, वाष्पीकरण की कमी को घटाना, भूजल की क्षमता को बढ़ाना एवं तटीय जल को उचित स्थानों से स्थानांतिरत करना जैसे उपायों को अपनाना होगा। कम जल की जरूरत वाले प्रक्रयाओं को जैसे- चराई, वानिकी एवं अन्य विकासशील उपायों की ओर ध्यान एवं बढ़ावा देना होगा। जल संसाधन विकास परियोजनाओं के तैयार करते समय अकाल प्रवण क्षेत्रों की ओर मुख्य रूप से ध्यान देना होगा।

अकाल प्रभावित आबादी को रोज़गार प्रदान करना अकाल राहत कार्य का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए।

भू-जल

राज्य का कुल पुनर्भरणीय भूजल संसाधन 84 बीसएम (68.1 एमएएफ) है। जिसमें से 72 बीसीएम (58.4 एमएएफ) सिंचाई उद्देश्य के लिए उपयोग में लायी जाती है, पुनर्भरणीय संसाधन का 85.7 प्रतिशत है। कुल पुनर्भरणीय संसाधन वर्तमान कुल निकास लगभग 40.95 बीसीएम (33.2 एमएएफ) है एवं कुल उपयोग 27 बीसीएम (21.9 एमएएफ) है जो निकासी का कुल 65.9 प्रतिशत है। अतः भविष्य के लिए उपस्थित भू-जल संसाधन 43.95 (34.8 एमएएफ) है। हालांकि इन संसाधनों को अनियमित रूप से क्षेत्र में बांट दिया गया है। इस संसाधन का भविष्य में विकास हेतु क्षेत्रीय विभाजन पश्चिमी, केंद्रीय, पूर्वीय, बुंदेलखंड एवं पहाड़ी क्षेत्रों में किया गया है जो कृमशः 14.8 बीसीएम (12 एमएएफ), 8.5 बीसीएम (6.9 एमएएफ), 16 बीसीएम (13 एमएएफ) 2.5 बीसीएम (2 एमएएफ) एवं 1.25 बीसीएम (1 एमएफ) है। यह साफ दर्शाता है कि अभी भी पर्याप्त मात्रा में भू-जल का उपयोग किया जा सकता है लेकिन असंतुलित विशेष वितरण के कारण वर्तमान क्षेत्रीय भू-जल का उपयोग का संतुलन काफी हद तक बिगड़ चुका है। राज्य के 819 खंड में से 85 “डार्क खंड” हैं एवं 214 “ग्रे खंड” हैं, जिनमें पश्चिमी क्षेत्र में 67 “डार्क खंड” एवं 86 “ग्रे खंड” हैं, केंद्रीय क्षेत्र में 15 “डार्क खंड” एवं 38 “ग्रे खंड” हैं, पूर्वी क्षेत्र में 12 “डार्क खंड” एवं 90 “ग्रे खंड” हैं एवं बुंदेलखंड में 1 “डार्क खंड” है।

वर्तमान स्थिति

बढ़ती आबादी को देखते हुए ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 तक घरेलू, औद्दोगिक एवं सिंचाई जरूरतों के मद्देनजर भू-जल स्तर उपयोग में बढ़ोत्तरी होगी जो 27 बीसीएम (21.9 एमएएफ) से बढ़कर 64 बीसीएम (51.9 एमएएफ) हो जाएगा, जिसका मतलब है कि 2025 में भू-जल की मांग अभी के मुकाबले दो गुनी हो जाएगी। जिसके कारण वर्ष 2025 तक ओवर-एक्सप्लोएटड ब्लॉक्स की संख्या 14 से बढ़कर 177 हो जाएगी।

जल संसाधनों के अत्यधिक उपयोग को रोकने एवं उसके सही उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए एक अच्छे प्रबंधन की जरूरत है, जिसके लिए निम्न कदम उठाए जाने चाहिए:-

  • उपयुक्त सिंचाई तकनीकि जैसे पाइपिंग ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई के इस्तेमाल से अच्छे प्रबंधन एवं संरक्षण में मदद मिलेगी।
  • लो वॉटर इंटेंसिटी क्रॉपिंग पैटर्न में आने वाली बाधाओं एवं उनके कारणों की बतौर डिमांड साइड मैनेजमेन्ट के संघटक के रूप में निरीक्षण होना चाहिए।
  • संयुक्त उपयोग : संयुक्त प्रबंधन एवं भू-जल रिचार्ज भू-जल प्रबंधन की सूची में प्रमुख होने चाहिए। भू-जल को बढ़ाने के लिए कृत्रिम तरीके जैसे नदी प्रणाली के अंतर्गत उप-घाटी के बीच अधिवेश मानसून अपवाह अपनाना चाहिए, जिसे विभिन्न उचित रिचार्ज तकनीक जैसे- डार्क एवं ग्रे ब्लॉक में रिचार्ज तालाबों के निर्माण/प्रीकोलेशन टैंक एवं उपलब्ध तालाबों का डीसिल्टेशन, उपलब्ध तालाबों में पुनर्भरण शाफ्ट के निर्माण, ग्रेविटी हैड रिचार्ज वेल के निर्माण एवं मौजूदा नलकूपों/कुओं को ग्रेविटी हैड रिचार्ज वेल में तब्दील कर, जल संरक्षण के लिए नाला मेड़, कंटूर मेड़, गली प्लग आदि के ढांचे का निर्माण कर, रिचार्ज घाटी आदि के निर्माण के जरिए मौजूद जलभृतों में स्थानंतरित एवं जमा किया जा सकता है। किसी भी रिचार्ज परियोजना के अपनाने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि ऐसी परियोजनाएं भू-जल जलभृतों को न दूषित करें।
  • विनियमन : अन्य बाधओं को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसे उपाय अपनाये जाने चाहिए जिससे जिन क्षेत्रों में तीव्रता से भू-जल में कमी होती जा रही है वहां बाध्य भू-जल का उपयोग किस तरीके से किया जा सके।

डाटा

वर्ष 2025 तक शहरी एवं ग्रमीण आबादी को पेयजल एवं घरेलू जल उपयोग की जरूरतों को सुनिश्चित करना होगा। वर्तमान में शहरी एवं ग्रमीण क्षेत्रों में जल का उपयोग क्रमशः 1.7 बीसीएम (1.4 एमएएफ) एवं 2.6 बीसीएम (2.1 एमएएफ) है। शहरी एवं ग्रामीण आबादी की अनुमानित जरूरत लगभग 3.2 बीसीएम (2.6 एमएएफ) एवं 4.6 बीसीएम (03.7 एमएएफ) है। जल संसाधनों पर इन जरूरतों को सुनिश्चित करना ही राज्य की प्राथमिकता होनी चाहिए।

परिप्रेक्ष्य योजना

परिप्रेक्ष्य योजना के तहत 2025 इन जरूरतों को सुनिश्चित करना है एवं इस लक्षय को प्राप्त करने के लिए राज्य स्त्रोतों एवं अन्य संस्थाओं द्वारा राशी स्वीकृत कराकर उचित संसाधनों को उपलब्ध कराना है। ऐसे उपाय एवं कदम उठाए जाएंगे जिससे आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के दृष्टिकोण से जलपूर्ति को आत्मनिर्भर बनाया जा सके जिससे कम से कम ओ एंड एम कॉस्ट की भरपाई की जा सके।

वैश्विक कवरेज को अपनाने एवं लागू करने के उद्देश्य से जल आपूर्ति एवं स्वच्छता के दृष्टिकोण से जल संसाधन एवं मल संग्रह जैसी सुविधाओं का उचित वितरण एवं उनका उपचार एवं निराकरण किया जाना चाहिए।

अन्य घरेलू और औद्योगिक जरूरतों

2025 तक अनुमानित घरेलू एवं औद्दोगिक जरूरतों के दृष्टिकोण से 4.4 बीसीएम (3.6 एमएएफ) तक होने की संभावना है। घरेलू एवं औद्दोगिक जरूरतों की आपूर्ति करने हेतु पर्याप्त जल संसाधनों का आवंटन किया जाना चाहिए और यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि राज्य स्तर पर औद्दोगिक स्थिति के विकास में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए।

कुछ उद्दोगों को छोड़कर सभी उद्दोगों को पानी की लागत के साथ साथ संसाधन एवं उनके संरक्षण के विकास राशी का वहन करना होगा जिससे इन संसाधनों की कमियों का मूल्यांकन किया जा सके एवं जिसे समय समय पर स्थिर किया जा सके।

सतही एवं भू-जल के प्रदूषण को खत्म करने एवं उसकी आवश्यक्ता को कम करने के लिए औद्दोगिक जल संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण पर काम करना होगा। औद्दोगिक द्वारा इस्तेमाल किए गए जल का उपचार एवं उसे पुनः उपयोग करने की प्रणाली को सख्ती से लागू करना होगा।

पारिस्थितिकी स्वास्थ्य मनोरंजन एवं अन्य जरूरतों :

सभी जल संसाधन परियोजनाओं को पारिस्थितिकि स्वास्थय एवं अन्य जरूरतों के दृष्टिकोण से पर्यापत एवं उचित प्रावधान बनाए जाने चाहिए।

जल संसाधनों की योजना बनाते समय जब भी जरूरी लगे नेविगेशन के विकास की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। यद्दपि इस उद्देश्य के लिए कोई महत्वपर्ण तपेदिक उपयोग नहीं फिर भी कुछ जल संसाधनों में कुछ प्रतिबंध को लागू किया जाना चाहिए।

हाईड्रो एवं थर्मल पावर की आवश्यक्ताएं

वर्तमान स्थिति

वर्तमान में राज्य में 11624 मेगावॉट की थर्मल क्षमता स्थापित है जिसमें से 5775 मेगावॉट यूपीएसईबी एवं 5849 मेगावॉट कंद्रीय सेक्टर में स्थापित है। केंद्रीय सेक्टर परियोजना में यूपी का 2600 मेगावॉट हिस्सा है। इसके अतिरिक्त यूपी में 440 मेगावॉट की परमाणु शक्ति स्थापित है जिसमें राज्य का 154 मेगावॉट हिस्सा है। यूपीएसबी का हाईर्ड्रो स्थापना 1504 मेगावॉट है जिसे केंद्र सेक्टर के 945 मेगावॉट की स्थापना में से 236 मेगावॉट का हिस्सा प्राप्त होता है। इस प्रकार यूपी में थर्मल एवं हाईड्रो सेक्टर की कुल स्थापना क्रमशः 8252 मेगावॉट एवं 1740 मेगावॉट है जो 85¬:17 थर्मल हाईड्रो मिश्रण के अनुपात में है। वर्तमान में थर्मल स्टेशनों में जल को ठंडा करने के लिए तापेदिक आवश्यकता 12.46 क्योम्स (440 क्यूसेक) है यानी लगभग 0.37 बीसीएम (0.3 एमएएफ), हालांकि इसका कुल मसौदा और अधिक है। 2020 तक अनुमानित थर्मल पावर का तपेदिक इस्तेमाल लगभग 50.97 क्यूम्स (1800 क्यूसेक) यानी लगभग 1.60 बीसीएम (1.3 एमएएफ) है, जो लगभग 45000 मेगावॉट की स्थापना के अनुरूप होगा (केंद्रीय एवं निजी सेक्टर को मिलाकर)।

हाइड्रो थर्मल मिक्स

हाईड्रो सेक्टर में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जिससे कि नई परियोजनाओं के निर्णाण को क्रियान्वित किया जा सके जिससे कि उपलब्ध जल संसाधनों का अनुकूल इस्तेमाल किया जा सके (विशेष तौर पर बहुउद्देशीय परियोजनाओं को लेकर) एवं थर्मल हाईड्रों मिश्रण को 60:40 के अनुपात से विकसशील बनाया जा सके।

वर्तमान एवं भविष्य में आने वाली जरूरतों को पूरा करने हेतु, जल संसाधन के आवंटन के लिए इन आवश्यकताओं को समयोजित करना होगा जिससे कि बिजली विकास में इस आधार पर कोई दिक्कत नहीं आए। थर्मल पावर क्षेत्र को जल लागत के साथ साथ विकास दर एवं उसके संरक्षण की लागत को वहन करना होगा जिससे की समय समय पर उसे सुधारा जा सके।

सहभागीदारी के दृष्टिकोण से जल संसाधन प्रबंधऩ

विभिन्न प्रकार के इस्तेमाल के लिए जल संसाधन प्रबंधन भागीदारी दृष्टिकोण से होनी चाहिए, जिसमें योजना, डिजाइन, विकास एवं प्रबंधन के दृष्टिकोण से न सिर्फ सरकारी एजंसियों को ही सम्मिलित किया जाए वरन् उपभोक्ताओं एवं अन्य हितधारकों को प्रभावी एवं निर्णायक ढंग से सम्मिलित किया जाना चाहिए। उक्त उद्देश्यों को क्रियान्वित करने हेतु विभिन्न स्तरों पर आवश्यक कानूनी एवं संस्थागत परिवर्तन किए जाने चाहिए। जल उपभोक्ता संघ एवं स्थानीय निकायों जैसे म्युनिसिपाल्टी एवं ग्राम पंचायत को भी जल अवसंरचना/सुविधा के संचालन, संरक्षण एवं प्रबंधन में उपयुक्त स्तर पर सम्मिलित किया जाना चाहिए जिससे उन सुविधाओं के प्रबंधन को संघ/क्षेत्रीय निकायों को स्थानांतरित किया जा सके।

वित्तीय एवं भौतिक स्थिरता

विभिन्न उपयोग के लिए अतिरिक्त जल संसाधन सुविधा का निर्माण के साथ मौजूद सुविधाओं पर पर्याप्त भौतिक एवं आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की जरूरत भी है। अतः विभिन्न उपयोगों के लिए जल शुल्क के निर्धारण को कुछ इस प्रकार सुनिश्चित करना होगा कि कम से कम उससे संचालन एवं संरक्षण लागत की भरपाई हो सके जिससे शुरुआत में सेवाएं प्रदान की जा सकें एवं पूंजी का हिस्सा प्राप्त हो सके। इस लागत को सीधा प्रदान की गई सुविधाओं की गुणवत्ता से लिंक किया जाना चाहिए।

संस्थागत व्यवस्था

वर्तमान में विभिन्न इस्तेमाल हेतु संबंधित विभागों द्वारा जल संसाधन योजना बनाई जा रही। इस संसाधन के मूल्य एवं नियोजित विकास का समन्वय की महत्ता को समझते हुए राज्य सरकार ने प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में “राज्य जल बोर्ड” का गठन किया है।

विधि

जल संसाधन की कमी एवं उसकी कीमत को समझते हुए एवं उसकी आवश्यकता एवं संरक्षण को ध्यान में रखते हुए एवं उसे प्रदूषण मुक्त संसाधन बनाने हेतु एवं इसके महत्वता को सुनिश्चित करने हेतु निम्न विधियों पर गहनता पूर्वक विचार किया जाना चाहिए-

  • विविध उपयोगों के लिए सतही एवं भू-जल के उपयोग का विनियमन.
  • विभिन्न एजेंसियों द्वारा सतही एवं भू-जल स्त्रोतों में किए गए निर्वहन का विनियमन।
  • सिंचाई एवं विभिन्न उपयोगों के लिए संघों को अधिक मात्रा में जल आपूर्ति का विनियमन।
  • उपभोक्ताओं के हित में जल अधिकार का निर्माण।.
  • उपभोक्ताओं को खासतौर पर छोटे एवं सीमांत कृषकों को सिंचाई प्रणालीयों का हस्तांतरण करना।

प्रदर्शन में सुधार

जल संसाधन क्षेत्र प्रबंधन को प्रमुखता से क्रियनवान करने हेतु प्रबंधन में तत्काल बदलाव की आवश्यकता है। जलसंसाधन की आधिकारिक संरचना का विस्तार एवं वर्तमान स्थिति को देखते हुए अब मौजूद जल संसाधन सुविधाओं के कार्यों में विस्तार रूप से सुधार की आवश्यकता है। अतः जल संसाधन क्षेत्र में राशी आवंटित करते समय फिर से प्राथमिकताओं पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है जिससे विकास के आवश्यकताओं को सुनिश्चित किया जा सके एवं क्षेत्र में अन्य गतिविधयों के साथ-साथ धनराशी आवंटन सुविधाओं के संचालन एवं संरक्षण को भी सुनिश्चित किया जा सके।

निजी क्षेत्र की भागीदारी

जल संसाधन परियोजना के विभिन्न उपयोगों के दृष्टिकोण से योजना, विकास एवं प्रबंधन के सभी पहलुओं पर गौर करते हुए जहां भी उचित लगे वहां निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उपभोक्ताओं को जवाबदेही एवं सेवा सुधार में दक्षता लाने के लिए निजी क्षेत्र की भागदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिससे नवीन विचारों को प्रस्तुत करने, वित्तीय संसाधनों के सृजन एवं कॉर्पोरेट प्रबंधन शुरू करने में मदद मिलेगी। विशिष्ट परिस्थितियों के दृष्टिकोण से जल संसाधन सुविधाओं के निजी क्षेत्र की भागीदारी के विभिन्न संयोजनों, निर्माण में, खरीदने, संचालन, पट्टे पर देना एवं स्थानांतरण पर विचार किया जा सकता है।

विज्ञान एवं तकनीक

हमारे जल संसाधन के प्रभावी और किफायती प्रबंधन के लिए क्षेत्र से जुड़े विशषज्ञों को आगे आना चाहिए एवं निम्न बिंदुओं पर गौर करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान कर उसे एक नई दिशा प्रदान करनी चाहिए :

  • हाईड्रोमीटरोलॉजी
  • जलसंसाधन का आकलन
  • हिमपात एवं झील जलविज्ञान
  • भूमिगत जल विज्ञान और पुनर्भरण
  • जल गुणवत्ता
  • लवणता प्रवेश की रोकथाम
  • जलभराव और मृदा लवणता की रोकथाम
  • जल संचयन
  • वाष्पीकरण एवं रसाव घाटा
  • डब्लू.आर परियोजना का आर्थिक डिजाइन
  • भूकम्प विज्ञान और संरचनाओं की एक भूकंपीय डिजाइन
  • संरचनाओं में उन्नत संख्यात्मक विश्लेषण
  • फसलों और फसल प्रणालियां
  • जलाशयों के अवसादन
  • जल संबंधि संरचनाओं का दीर्धकाल एवं सुरक्षा
  • नदी आकृति विज्ञान एवं हाइड्रोलिक्स
  • मिट्टी और सामग्री अनुसंधान; नवीन निर्माण सामग्री एवं तकनीक (रोलर ठोस कंक्रीट, फाईबर प्रबलित कंक्रीट, टनलिंग तकनीक में नए उपाय, संरचनाओं में इंस्ट्रूमेंटेशन उन्नत सांख्यिक विश्लेषण एवं पुनः विश्लेषण के विशेष संदर्भ में)।
  • विकास और प्रबंधन में रिमोट सेंसिंग तकनीक का प्रयोग करें।
  • बेहतर जल प्रबंधन कार्यों एवं संचालन तकनीक में सुधार।
  • रीसाइक्लिंग और पुन: उपयोग।
  • जोखिम विश्लेषण आपदा प्रबंधन।

प्रशिक्षण

जल संसाधन विकास के लिए मानकीकृत प्रशिक्षण परिप्रेक्ष्य योजना का एक अहम हिस्सा होना चाहिए। सूचना प्रणाली, क्षेत्रीय योजना, परियोजना योजना एवं निर्माण, परियोजना प्रबंधन, परियोजनाओं एवं उसकी भौतिक संरचनाएं एवं प्रणालियों एवं जल वितरण प्रणाली के प्रबंधन का संचालन में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इन गतिविधियों में शामिल सभी श्रेणियों के कर्मचारियों एवं किसानों को इसका प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

उपसंघार

मानव जीवन एवं पशु जीवन में जल की महत्ता को देखते हुए, पारिस्थितिक संतुलन एवं आर्थिक एवं हर प्रकार की विकासशील गतिविधियों के दृष्टिकोण से एवं इसकी कमी को गहनता पूर्वक लेते हुए, इस संसाधन की योजना एवं प्रबंधन एवं अनुकूल, आर्थिक और न्यायसंगत उपयोग को देखते हुए यह एक अत्यंत विचाराधीन मुद्दा बन चुका है। राज्य जल नीति की सफलता पूरी तरीके से उसके सिद्धांतों एवं लक्ष्यों की आम सहमति एवं वादों के विकास एवं संरक्षण पर निर्भर करती है।

एसडब्ल्यूपी के लिए कार्य योजना

राज्य जल नीति प्रदेश के हर जल संसाधन पर लागू किया जाएगा।

राज्य जल नीति के प्रभावी एवं उद्देशीय संचालन के लिए पर्याप्त संगठन की आवश्यकता है। सरकार ने पहले ही प्रमुख सचिव के अध्यक्षता में राज्य जल बोर्ड का गठन कर दिया है। संगठऩ को पूरी दृढ़ निश्चय करके कार्य करना होगा जिससे की अनुमानित लक्ष्य की प्राप्ति की जा सके। राज्य जल बोर्ड के विभिन्न इकाइयों द्वारा प्रमुख रूप से निम्न विषयों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

  • राज्य जल योजना कार्यलय:- राज्य के सभी जल संसाधनों की योजना बनाने के लिए भू-जल, जल निकायों एवं बाढ़ नियंत्रण मुख्य रूप से घाटी/उप-घाटी के संदर्भ को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। यह कार्यलय राज्य जल बोर्ड के लिए बतौर तकनीकि सचिवालय काम करेगा। यह सचिवालय सदा जल संसाधन के लिए एक संचालित निकाय की तरह काम करेगा।
  • राज्य जल संसाधन डाटा केंद्र- जल संसाधन डाटा का संग्रहण और भंडारण एवं उसे उपभोक्ता के अनुरूप उपलब्ध करना।.
  • प्रभावी प्रबंधन सूचना प्रणाली को विकासशील बनाना।

सतही एवं भू-जल संसाधन के विनियमन एवं नियंत्रण के लिए कानून का अधिनियम बनाना एवं उसका संयुक्त रूप से उपयोग करना।

प्रबंधन एवं प्राधिकरण के विकेन्द्रीकरण में उपभोक्ता की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक और विधायी सुधार।

एकीकृत आधार पर घाटी/उप-घाटी के विकास की संकल्पना के अंतर्गत राज्य के जल संसाधन विकास के लिए परिप्रेक्ष्य योजना की योजना बनाना। प्रस्तावित विकास बहु-क्षेत्रीय आधार पर होना चाहिए। घाटी/उप-घाटी योजना बनाते समय बाढ़ नियंत्रण एवं जल निकासी एवं रिसाव नियंत्रण उपायों की ओर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। योजना में निम्न बिंदु सम्मिलित किए जाने चाहिए:

  • बाढ़ नियंत्रण एवं जल निकासी सहित सिंचाई विकास।
  • पेयजल
  • जलविद्युत विकास
  • कृषि उद्योगों सहित औद्योगिक उपयोग
  • नेविगेशन एवं मनोरंजन
  • पारिस्थितिकी आवश्यकताओं

विकास नीति को इस प्रकार बनाया जाना चाहिए जिससे निर्धारित समय के भीतर ही निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति की जा सके। राज्य जल बोर्ड के तकनीक सचिवालय एवं एस.डब्लू.आर.डी.सी के वित्तीय पूर्वानुमान की रूपरेखा का संकेत किया जाना चाहिए।

समय निर्धारण एवं वित्तीय पूर्वनुमान के साथ सभी संबंधित उपभोक्ता विभागों द्वारा एक मत रखते हुए जल संसाधन विकास परियजोना बनायी जानी चाहिए।

बड़े एवं मध्य सिंचाई विकास के क्षेत्र के लिए परिप्रेक्ष्य योजना के निम्न लक्षण होने चाहिए :-

1 सिंचाई 12.5 लाख हेक्टेयर
2 आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक बनायी गयी क्षमता 7.04 लाख हेक्टेयर
3 नवीं पंचवर्षीय योजना की शुरुआत में योजनाओं की संख्या 29
4 इन योजनाओं के खत्म होने तक अनुमानित सिंचाई क्षमता की संरचना। 2.9 लाख हेक्टेयर
5 योजना अवधि के दौरान पूरी की जाने वाली योजनाएं. 20
6 योजनाओं के पूरा होने की कुल लागत (1997 base) 4700 करोड़
7 नवी योजना के लिए धन की न्यूनतम आवश्यकता. 3800 करोड़
8 नवी योजना के दौरान अनुमानित सिंचाई क्षमता की संरचना 1.0 लाख हेक्टेयर
9 तैयार योजना पर जिनकी अभी तक शुरुआत नहीं हुई 34
10 अतिरिक्त सिंचाई क्षमता 2.56 लाख हेक्टेयर
11 दसवीं योजना के दौरान एवं वर्ष 2020 तक परियोजनाओं की कुल लागत 20,000 करोड़
12 अनुमानित सिंचाई क्षमता की संरचना 5.46 लाख हेक्टेयर

जल संसाधन विकास की तरह ही जलविद्युत विकास एवं पेयजल क्षेत्र भी अन्य प्रमुख लागत गहन वाले क्षेत्र हैं।