याॅत्रिक संगठन

तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न पर आत्मनिर्भरता के दृष्टिकोंण से अधिक खाद्यान्न का उत्पादन किया जाना प्रदेश की आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति हेतु प्रदेश सरकार द्वारा अधिक से अधिक कृषि योग्य क्षेत्र सिंचाई सुविधा के अन्तर्गत लाने का प्रयास किया गया है। खाद्यान्न की उपज बढ़ाने के लिये रसायनिक खाद व उन्नत बीजों का उपयोग बढ़ने के कारण जल की माँग बढ़ रही है। कृषि, औद्योगिक व शहरी क्षेत्रों में 70 के दशक के बाद भूगर्भ जल का अप्रत्याशित विकास/दोहन देखने में आया है। भूगर्भ जल आधारित सिंचाई से जहाँ कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है, वहीं पेयजल आपूर्ति एवं औद्योगिक सेक्टर की जल मांग को पूरा करने में भी इस संसाधन का सर्वाधिक योगदान रहा है। परन्तु, इसके अनियोजित व असीमित दोहन होने से प्रतिकूल प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं, जिसमें जल स्तर में गिरावट, भूजल की उपलब्धता में कमी, उथले नलकूपों/नलकूपों की असफलता, भूजल प्रदूषण आदि समस्याएं प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, राज्य के कई भागों, शहरी एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में, भूगर्भ जल स्रोतों की उपलब्धता में चिन्ताजनक स्तर तक कमी आ गयी है।

भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च, 2011 के आॅकडा़ें के आधार प्रदेश में भू-जल संसाधनों का आॅकलन किया गया है, जिसके अनुसार प्रदेश के 75 जनपदों के 820 विकास खण्डों में 111 विकास खण्ड अतिदोहित (व्अमत मगचसवपजमक), 68 विकास खण्ड क्रिटिकल, 82 विकास खण्ड सेमीक्रिटिकल तथा शेष 559 विकास खण्ड सुरक्षित श्रेणी में वर्गीकृत किये गये हैं। विगत वषाेँ  में किये गये भू-जल संसाधनों के आॅकलन की तुलना में संकटग्रस्त (अतिदोहित एवं क्रिटिकल) विकास खण्डों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रदेश सरकार द्वारा इन 111 अतिदोहित एवं 68 क्रिटिकल विकास खण्डों, यानी कुल 179 विकास खण्डों में जो कि प्रदेश के 44 जनपदों में अवस्थित हैं, में राजकीय नलकूपों का निर्माण प्रतिबन्धित है। इस परिपेक्ष्य में सिंचाई विभाग के याॅत्रिक संगठन द्वारा राजकीय नलकूपों से भू-जल का सीमित दोहन करते हुए एवं डाल नहरों से सतही जल का उपयोग करके कृषकों को सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध कराये जाने का दायित्व और भी बढ़ जाता है।

याॅत्रिक संगठन के कार्य

सिंचाई जल के प्रबन्ध हेतु आवश्य्कता के अनुसार बृहद, मध्यम एवं लघु सिंचाई योजनायें प्राकृतिक जल संसाधनों का उपयोग करते हुये निर्मित की जा रही हैं। सिंचाई विभाग के याॅत्रिक संगठन के मुख्य कार्याें में सिंचाई हेतु राजकीय नलकूपों एवं लघु डाल नहरों से भूमिगत एवं सतही जल की व्यवस्था, राजकीय नलकूपाे एवं लघु डाल नहरों का अनुरक्षण, वृहद एवं मध्यम डाल नहरों के शीर्श कार्य/पम्प हाउस का रख-रखाव भूमिगत जल के उपयोग हेतु नये नलकूपों का निर्माण, असफल राजकीय नलकूपों का पुनःनिर्माण तथा सतही जल से सिंचाई हेतु नवीन लघु डाल नहरों का निर्माण, उनका आधुनिकीकरण एवं क्षमता वृद्धि से सम्बन्धित परियोजनाओं का निर्माण कार्य सम्मिलित है। याॅत्रिक संगठन द्वारा सिंचाई कार्यशालाओं में राजकीय नलकूपों से सम्बन्धित हार्डवेयर एवं पुर्जा का निर्माण तथा जल याॅत्रिक उपकरणों यथा बैराज गेट्स इत्यादि का निर्माण भी किया जाता है।