विभाग का इतिहास

भूमिका

जल प्रकृति की बहुमूल्‍य देन है जल के बिना जीवन तथा सभ्‍यता के अस्तित्‍व की कल्‍पना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने अपना पहला बसेरा वहीं बनाया जहॉं जल आसानी से उपलब्‍ध था। प्राचीन काल से ही सभ्‍यता का विकास जल से जुड़ा है। मानव बस्तियों की स्‍थापना किसी न किसी जल स्रोत के निकट ही हुई। सभ्‍यता के सुप्रभात से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। आज भी लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्‍या की जाविका कृषि पर आधरित है। कृषि के लिए सिंचाई एक परमावश्‍यक निवेश है। सिंचाई के लिऐ जल का मुख्‍य स्रोत वर्षापात है। हमारे देश में वर्षापात के वितरण में क्षेत्रवार और समयवार भारी असमानता है। जहॉं एक ओर पश्चिमी राजस्‍थान में औसत वर्षा 100 मि.मी. है वही दूसरी ओर पशिमी मेघालय के चेरापूंजी में 11000 मि0मि0 सामान्‍य वर्षा होती है। कतिपय वर्षो में बहुत कम वर्षा होने के कारण सूखे की स्थिति भी उत्‍पन्‍न होती रही है। उत्‍तरी भारत में गंगा का मैदानी भाग कृषि के लिए सर्वथा उपयुक्‍त माना जाता है लेकिन इस क्षेत्र में वर्षा के न होने की स्थिति में अकाल पड़ने का लम्‍बा इतिहास रहा है। वर्ष 1770 ई0 में निचले बंगाल एवं बिहार में अत्‍यन्‍त भयानक सूखा पड़ा जिसके कारण काफ़ी जनसंख्‍या का विनाश हो गया। वर्ष 1837 में उत्‍तरी भारत में 19वीं शताब्‍दी का पहला भयानक सूखा पड़ा जिसके कारण लगभग एक तिहाई जनसंख्‍या का विनाश हो गया। इस सूखे ने ब्रिटिश सरकार का ध्‍यान इस ओर आकर्षित किया कि प्रदेश की सदानीरा नहरें निकालकर कृषि को सूखे की स्थिति से बचाया जाय। प्राचीन काल के हिन्‍दुशास्‍त्रों में भी सिंचाई एवं सिंचाई व्‍यवस्‍था के निर्माण में गहरी रूचि होने की झलक मिलती है। 300 वर्ष ईसा पूर्व चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य की सभा में सेल्‍यूकश के राजदूत मेगास्‍थनीज ने भारत में सिंचाई व्‍यवस्‍था पर विचार व्‍यक्‍त करते हुए लिखा है कि उस समय सम्‍पूर्ण भारतवर्ष में अच्‍छी सिंचाई व्‍यवस्‍था थी। ‘’कौटिल्‍य’’ ने भी अपने ग्रन्‍थ अर्थशास्‍त्र में राजा को सलाह दी है कि शत्रुओं पर विजय पाने के लिए शत्रुराज्‍य की भूमि को, उनके राज्‍य की सीमाओं के अन्‍तर्गत बने बाधों नहरो एवं तटबन्‍धों को तोड़कर, जलप्‍लावित कर दो। कौटिल्‍य ने नहरो एवं बांधों का उल्‍लेख अन्‍य संदर्भों में किया है। उनके अर्थशास्‍त्र में यह उल्‍लेख मिलता है कि नदियों, झीलों, बॉंधों एवं मशीन चलित कुओं से पानी के उपयोग पर कृषि उत्‍पादन के चौथाई अंश को राजस्‍व के रूप राजा को देना होता था। यदि निजी बॉंधों का रखरखाव पॉंच वर्षों तक उपेक्षित रहता था तो राज्‍य द्वारा उनको अपने अधीन कर लिया जाता था। यदि किसी बॉंध आदि का निर्माण जनता के सहयोग से किया जाता था तो उस स्थिति में 4 वर्ष तक राजस्‍व कर में छूट दी जाती थी। ईसा से 400 वर्ष पूर्व महाराजा नंद द्वारा एक जल सेतु का निर्माण किया गया था जो कि काफी लम्‍बे समय तक उपेक्षित रहा। ईसा के 100 वर्ष पूर्व उड़ी‍सा के महान शासक खारवेल (Kharvela) द्वारा इस जल सेतु को पुन: उपयोग में लाये जाने योग्‍य बनाया गया । आज से लगभग 1700 वर्ष पूर्व मद्रास के स्‍थानीय अभियन्‍ताओं द्वारा तंजौर जिले में शानदार एनीकट (वियर) का निर्माण कराया गया जो कि इस तरह के कार्य का पहला उदाहरण था।

ब्रिटिश काल के पूर्व:

उत्‍तरी भारत में सिन्‍धु एवं गंगा जैसी सदानीरा नदियों के होने के कारण उसके पानी को आप्लवनी (Inundation) नहरें बनाकर सिंचाई के लिए उपयोग करना अपेक्षाकृत आसान था। भारत की मुख्‍य आप्लवनी नहरें सिन्‍धु नदी एवं इसकी पाँच सहायक नदियों से निकाली गयी । ऐसा कहा जाता है कि इन आप्लवनी नहरों का निर्माण अफगान शासकों द्वारा कराया गया था। पंजाब प्रान्‍त में इस प्रकार की आप्लवनी नहरों की कुल लम्‍बाई 480 कि0मी0 के आसपास थी और सिन्‍धु प्रान्‍त में आप्लवनी नहरों की लम्‍बाई लगभग 4160 कि.मी. थी और इनसे लगभग 6.8 लाख हेक्‍टेयर फसलों की सिंचाई होती थी। पंजाब एवं सिन्‍धु प्रान्‍तों में 19 वीं शताब्‍दी के अन्‍त तक इस भूभाग की लगभग 12.0 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र की सिंचाई इन आप्लवनी नहरों पर निर्भर रहने लगी। इन नहरों का रखरखाव एवं प्रबन्‍धन सरकार द्वारा किया जाता था। उत्‍तरी भारत में सबसे पहले यमुना के दोनों तटों से नहर निकालने का कार्य किया गया। यमुना के पश्चिमी तट से निकाली गयी नहर का निर्माण 14वीं शताब्‍दी के मध्‍य फिरोजशाह ने हिसार के निकट स्थित अपने शिकारगाह की सिंचाई करने हेतु कराया था। नहर के रखरखाव पर समुचित ध्‍यान न दिये जाने के कारण यह नहर उपयोग के योग्‍य नहीं रह गयी, लेकिन 16वीं शताब्‍दी में अकबर महान द्वारा इस नहर के पुर्नस्‍थापना के आदेश दिये गये। तत्पश्‍चात 17वीं शताब्‍दी के आरम्‍भ में शाहजहॉं द्वारा पत्‍थरों को काटकर एवं जल सेतु का निर्माण कराकर अपने प्रतिभाशाली सहायक अलीमर्दनखॉं की सहायता से इस नहर को शाहजहानाबाद (दिल्‍ली) तक लाया गया। निर्माण के लगभग 125 वर्ष बाद तक यह दिल्‍ली नहर दक्षतापूर्वक कार्य करती रही। साम्राज्‍य के असंगठित हो जाने के कारण फिरोज नहर में 1707 से पानी चलना बन्‍द हो गया तथा 18वीं शताब्‍दी के मध्‍य तक मुगल नहर का अस्तित्‍व भी प्राय: समाप्‍त हो गया। इस प्रकार लगभग 400 वर्ष तक ज्‍यादा या कम दक्षता से चलने वाली यह नहर प्रणाली अन्तिम रूप से समाप्‍त हो गयी। यमुना नदी के बायें तट से निकलने वाली पूर्वी यमुना नहर, जिसे दोआब नहर के रूप से भी जाना जाता है, का श्रेय अलीमर्दनखान को जाता है। इस नहर के शीर्ष का निर्माण शिवालिक पहाडि़यों पर स्थित है तथा यह नहर शाहजहॉ के शिकारगाह ‘बादशाह महल’ से हो कर जाती थी। नहर के शीर्ष पर गम्‍भीर प्रकृति कठिनाइयों, जिनका निवारण मुगलकाल के अभियन्‍ताओं द्वारा सम्‍भव नहीं हो सका के कारण यह नहर एक सीजन से अधिक अवधि के लिए नहीं चल पायी। वर्ष 1780 में ‘जबीलाखान रोहिला’ द्वारा इस नहर को पुन: चलाया गया दुबारा खोदने के पश्‍चात् यह नहर मात्र कुछ महीने ही चल सकी।

ब्रिटिशकाल में नहर प्रणालियॉं:

ब्रिटिश शासनकाल में सिंचाई का विकास पुराने सिंचाई कार्यों को पुर्नजीवित करने, उनमें सुधार एवं विस्‍तार करने से प्रारम्‍भ किया गया। वर्ष 1817 में लार्ड हेस्टिंग्‍ज द्वारा इंजीनियर कोर के लेफटीनेन्‍ट ‘ब्‍लेन’ को यमुना के पश्चिमी तट से निकलने वाली दिल्‍ली शहर की देख रेख हेतु एवं 1822 में उसी कोर के लेफ्टीनेन्‍ट डिव्‍यूड को यमुना नदी के पूर्वी तट से निकलने वाली ‘दोआब नहर ’ की देख रेख हेतु नियुक्‍त किया गया। पश्चिमी यमुना नहर के शीर्ष की स्‍थापना लेफ्टीनेन्‍ट ब्‍लेन द्वारा इस प्रकार की गयी, जिससे बाढ़ की विभिषिका को नियंत्रित करने एवं नहरों में अबाधित पानी चलाने में सहायता मिली। इस नहर को सन् 1821 में चलाया गया। मुख्‍य नहर एवं शाखाओं की लम्‍बाई 712 कि.मी. थी। पूर्वी यमुना नहर का सर्वेक्षण लेफ्टीनेंट डिब्‍यूड द्वारा प्रथम बार 1822 में किया गया। तत्‍पश्‍चात इंजीनियर कोर के ही कर्नल रार्बट स्मिथ द्वारा इस नहर प्रणाली के विभिन्‍न कार्यों को 1830 में पूर्ण किया गया। इस नहर का सामान्‍य समरेखन वाटरशेड पर था। इन कार्यों के पूर्ण हो जाने के पश्‍चात् इस नहर को तीन जनवरी 1830 को प्रथम बार चलाया गया। लगभग 2 सप्‍ताह चलने के बाद दिनांक 20 जनवरी 1830 को यह पाया गया कि सहारनपुर के उत्‍तर और सुरावली के दक्षिण में नहर पर निर्मित सभी पुल गम्‍भीर रूप से क्षतिग्रस्‍त होने की स्थिति में पहुँच गये है। पक्‍के कार्यों के क्षतिग्रस्‍त होने की सम्‍भावना के साथ-साथ यह भी देखा गया कि नहर के ऊपरी भाग से भारी मात्रा में लाई गयी सिल्‍ट के कारण, नहर, सिंल्‍ट से भर गयी। इन समस्‍याओं के निराकरण हेतु यह कार्य कर्नल पी.टी. काटले, जो कि कर्नल स्मिथ के सहायक थे, को सौंपा गया। कर्नल काटले द्वारा आवश्‍यकतानुसार चिह्नित स्‍थानों पर फाल का निर्माण इस प्रकार कराया गया कि नहर की तली का ढाल 17 इंच से 24 इंच प्रतिमील रहा। पुनरोद्वार के पश्‍चात् वर्ष 1836 में यह नहर पुन: पूर्ण सफलता के साथ चलाई गयी। रमणीक दूनघाटी में भी बीजापुर एवं राजपुर नहरों का निर्माण भी कर्नल काटले द्वारा कराया गया। गंगा यमुना दोआब की उपजाऊ भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करने हेतु कर्नल काटले द्वारा गंगा के पानी का उपयोग करते हुए एक नहर ‚जिसकी परिकल्पित क्षमता 6750 क्‍यूसेक थी व जिसको ऊपरी गंगा नहर के नाम जाना जाता है, का निर्माण 1842 में प्रारम्‍भ किया गया तथा इस नहर को 8 अप्रैल 1854 को चलाया गया। यहॉं यह भी उल्‍लेखनीय है कि ऊपरी गंगा नहर निर्माण के पूर्व एवं निर्माण काल में विभिन्‍न समस्‍याओं का जिस सूक्ष्‍मता गहनता से अध्‍ययन किया गया सम्‍भवत: इस सीमा तक किसी अन्‍य परियोजना में नहीं किया गया। बुन्‍देलखण्‍ड प्रदेश का ऐसा क्षेत्र है जहॉं औसत वार्षिक वर्षा मात्र 760 मि.मी. है। फलत: इस क्षेत्र में सतही जल एवं भूगर्भ जल की सदैव कमी रहती है। अतः सिंचाई के लिए जल का भण्‍डारण तालाबों एवं जलाशयों में किया जाता है। 8वीं एवं 12वीं शताब्‍दी, के मध्‍य चन्‍देल शासकों द्वारा इस क्षेत्र में 4000 सरोवरों का निर्माण कराया गया जिनमें से कुछ आज भी मौजूद है। तत्‍पश्‍चात ब्रिटिश शासनकाल में इस क्षेत्र में बॉंधों का निर्माण कराकर उनसे सिंचाई के लिए नहरे निकाली गयी। वर्ष 1885 में जनपद जालौन एवं हमीरपुर के क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्‍ध कराने के प्रयोजन से बेतवा कैनाल का निर्माण पूर्ण कर उसमें पानी चालाना प्रारम्‍भ किया गया। वर्ष 1903 में द्वितीय सूखा आयोग ने भी कृषित क्षेत्र को पहले आयोग द्वारा संस्‍तुत सीमा तक सिंचाई सुविधा उपलब्‍ध कराने की सबल संस्‍‍तुति की। इन सुविधाओं को प्रदेश के दक्षिणी भाग में उपलब्‍ध कराने हेतु पूर्व क्रम में बॉंदा जिले में केन कैनाल वर्ष 1907 में जनपद हमीरपुर में धसान कैनाल वर्ष 1910 में तथा मिर्जापुर जिले में घाघरा एवं गरई नहरों का निर्माण क्रमश: 1913 व 1915 में किया गया। द्वितीय सूखा आयोग की संस्‍तुतियों के अनुसार प्रदेश के मध्‍य भाग में सिंचाई सुविधा उपलब्‍ध कराने हेतु शारदा नहर प्रणाली का निर्माण वर्ष 1919 में प्रारम्‍भ करके वर्ष 1928 में पूर्ण किया गया।

सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश की जीवन यात्रा के मील के पत्थर
1817 लार्ड हेस्टिंग्ज द्वार इंजीनियरिंग कोर, के लेफ्टीनेन्ट ब्लेन को यमुना नदी के पष्चिमी तट से निकलने वाली नहर की देख-रेख का दायित्व सौंपा गया।
1821 पश्चिमी यमुना नहर का संचालन।
1822 लार्ड हेस्टिंग्ज द्वार इंजीनियरिंग कोर, के लेफ्टीनेन्ट डिब्यूड को यमुना नदी के पूर्वी तट से निकलने वाली दोआब नहर की देख-रेख का दायित्व सौंपा गया।
1823 पहले सिंचाई कार्यालय की सहारनपुर में स्थापना।
1830 पूर्वी यमुना नहर का संचालन
1842 कर्नल काटले द्वारा ऊपरी गंगा नहर का निर्माण प्रारम्भ।
1854 ऊपरी गंगा नहर में पानी का संचालन।
1855 केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग की स्थापना।
1871 निचली गंगा नहर के निर्माण की स्वीकृति।
1878
  • आगरा नहर प्रणाली का निर्माण प्रारम्भ।
  • निचली गंगा नहर का संचालन प्रारम्भ।
1880 सूखा आयोग द्वारा बुन्देलखण्ड में कुल कृषि योग्य क्षेत्रफल के 40 प्रतिशत में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की संस्तुति।
1885 बेतवा नहर का निर्माण पूर्ण।
1886 बेतवा नहर को जालौन और हमीरपुर जिलों की सिंचाई के लिए  संचालित किया गया।
1898 फतेहपुर जल शाखा का निर्माण।
1903 द्वितीय सूखा आयोग का गठन, जिसमें प्रथम सूखा आयोग द्वारा संस्तुत सीमा तक सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की प्रबल संस्तुति की गयी।
1906 धसान नदी पर लहचूरा बांध का निर्माण प्रारम्भ।
1907 धसान नहर का निर्माण।
1909 धसान नदी पर पहाड़ी बांध का निर्माण प्रारम्भ।
1910
  • धसान नदी पर लहचूरा बांध का निर्माण पूर्ण।
  • ढुकवा बांध का निर्माण।
1912 धसान नदी पर पहाड़ी बांध का निर्माण पूर्ण।
1913 घाघर नहर का निर्माण।
1915
  • गरई नहर का निर्माण।
  • केन नदी पर गंगऊ बांध का निर्माण।
1919 शारदा नहर प्रणाली का निर्माण प्रारम्भ।
1928 शारदा नहर प्रणाली का निर्माण पूर्ण।
1952 माताटीला बांध का निर्माण प्रारम्भ।
1954 लोक निर्माण विभाग एवं सिंचाई विभाग का गठन।
1955 सिंचाई विभाग द्वारा पहला बाढ़ कार्य प्रारम्भ।
1956 यमुना नहर का परिकल्पित निस्सरण 800 क्यूसेक से बढ़ाकर 2500 क्यूसेक किया गया।
1957 नारायणी नहर प्रणाली का निर्माण पूर्ण।
1961
  • रिहन्द बांध का निर्माण।
  • रूड़की में सिंचाई अनुसंधान संस्थान की स्थापना।
1964
  • माताटीला बांध का निर्माण पूर्ण।
  • सिंचाई विभाग के लिए  प्राविधिक परीक्षा प्रकोष्ठ की सचिवालय में स्थापना।
1968 शारदा सहायक नहर का निर्माण प्रारम्भ।
1972 गण्डक नहर प्रणाली का निर्माण प्रारम्भ।
1973 राजघाट नहर का निर्माण प्रारम्भ।
1974 पश्चिमी प्रयागराज शाखा का निर्माण।
1977 कनहर परियोजना का प्रारम्भ।
1978
  • भीमगौड़ा बांध का निर्माण प्रारम्भ।
  • सरयू नहर का निर्माण प्रारम्भ।
1984
  • भीमगौड़ा बांध का निर्माण पूर्ण।
  • समानान्तर निचली गंगा नहर का निर्माण।
1994 गण्डक नहर प्रणाली पूर्ण।
1996 बाण सागर परियोजना का प्रारम्भ।
2003 उत्तर प्रदेश वॉटर सेक्टर रीस्ट्रक्चरिंग फेज-II में यूपीआईडी अधुनीकिकरण एवं क्षमता निर्माण गतिविधियों के साथ कंपोनेंट सी-I कंसॉलीडेशन एण्ड एन्हेंसमेंट ऑफ इरीगेशन रिफॉर्म्स ऑर्गनाइजेशन/डिपार्टमेंट परियोजना के तहत जुलाइ 2012 में सिंचाई विभाग में सूचना प्रणाली संस्था की स्थापना हुई। निम्न कार्यों का निष्पादन आईएसओ द्वारा आधुनिक तकनीक का मुख्य रूप से इस्तेमाल कर के किया जाना चाहिए।
  • रियल टाइम डिस्चार्ज हेतु कनाल प्रणाली के विभिन्न संरचना में एससीएडीए प्रणाली की स्थापना।
  • बाढ़ सूचना प्रणाली हेतु मोबाइल ऐप का विकास।
2017
  • बाढ़ सूचना प्रणाली में रिमोट सेंसिंग तकनीक की एप्लीकेशन।
  • अनुश्रवण प्रबंधन प्रणाली में वेब आधारित तकनीक के एप्लीकेशन।
2018
  • बाण सागर नहर परियोजना का समापन।
2019
  • 1910 में निर्मित पुराने लहचुरा बांध के डाउनस्ट्रीम में न्यू लहचुरा बांध का निर्माण
2021
  • सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना का समापन।
  • अर्जुन सहायक राष्ट्रीय परियोजना का समापन।
  • भवानी बांध परियोजना का समापन।
  • रसिन बांध परियोजना का समापन।
  • जाखलौन पंप नहर पर 2.5 मेगावाट का पहला कैनाल टॉप सोलर प्लांट चालू हुआ।
  • 3.42 मेगावॉट का दूसरा कैनाल टॉप सोलर प्लांट चालू हो गया है।
  • प्रथम स्प्रिंकलर सिंचाई परियोजना - जिला ललितपुर में मझगांव मिर्च स्प्रिंकलर परियोजना चालू हो गई।
2022
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